बस्तर के झुंड को बचाने 16 करोड़ का दांव:25 साल में क्लोन फेल, असम के 5 वनभैंसे बाड़े से ही नहीं निकले

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इंद्रावती टाइगर रिजर्व में मिले 25 से अधिक शुद्ध नस्ल के वनभैंसे छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वनभैंस की प्योर नस्ल बचाने के लिए वन विभाग 25 साल से प्रयोग कर रहा है। क्लोन तैयार करने पर दो करोड़ रुपए खर्च किए गए। असम से पांच वनभैंस लाए गए, लेकिन उन्हें भी पांच साल में जंगल में नहीं छोड़ा जा सका। अब बस्तर में मिले प्योर नस्ल के दो दर्जन से ज्यादा वनभैंसों के झुंड ने संरक्षण की नई उम्मीद जगाई है। बीजापुर के इंद्रावती टाइगर रिजर्व में महाराष्ट्र सीमा से लगे जंगल में मौजूद इस झुंड को बचाने के लिए 16 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। वनभैंसों को दूसरी जगह ले जाने के बजाय उनके मौजूदा रहवास को ही सुरक्षित बनाया जाएगा। इसके लिए संवेदनशील इलाके सील किए जाएंगे। चार से पांच एकड़ में बाड़ा बनेगा। पानी के लिए छोटे-बड़े जलाशय तैयार किए जाएंगे और शिकारियों की निगरानी के लिए हाईटेक कैमरे लगाए जाएंगे। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) ने संरक्षण योजना को मंजूरी दे दी है।
नस्ल बचाने के तीन प्रयोग, लेकिन नतीजा नहीं क्लोन पर दो करोड़ खर्च: वनभैंसों की संख्या बढ़ाने के लिए क्लोन तैयार किया गया। बाद में पता चला कि जिस मादा के आनुवंशिक नमूने से क्लोन बनाया गया था, वह सामान्य भैंस थी। इसलिए तैयार क्लोन को वनभैंस नहीं माना जा सका।
असम से पांच वनभैंस लाए, जंगल नहीं पहुंचे: संख्या बढ़ाने के लिए असम से पांच वनभैंस पकड़कर छत्तीसगढ़ लाए गए थे। इन्हें जंगल में छोड़ने की योजना थी, लेकिन करीब पांच साल से वे बारनवापारा अभयारण्य के बाड़े में हैं। जंगल में छोड़ने की मंजूरी अब तक नहीं मिली है। उदंती में अब सिर्फ ‘छोटू’: करीब 20 साल पहले उदंती-सीतानदी क्षेत्र में 20 से 22 वनभैंस थे। इनमें ज्यादातर नर थे। संख्या लगातार घटती गई। अब वहां प्योर और मूल नस्ल का केवल ‘छोटू’ नाम का वनभैंसा बचा है।
नक्सल प्रभावित जंगल में कैमरों से निगरानी वनभैंसों का यह झुंड नक्सल प्रभावित जंगल में है, जहां वन अमले की नियमित आवाजाही आसान नहीं है। इसलिए पूरे इलाके में हाईटेक कैमरे लगाए जाएंगे। इनसे वनभैंसों की गतिविधियों, संख्या और स्वास्थ्य पर नजर रखने के साथ शिकारियों की आवाजाही भी रिकॉर्ड की जाएगी। कुछ रहेंगे बाड़े में- संरक्षण योजना के तहत झुंड के कुछ वनभैंसों को चार-पांच एकड़ के बाड़े में रखा जाएगा, जबकि बाकी खुले जंगल में रहेंगे। इससे दोनों परिस्थितियों में उनकी सुरक्षा और व्यवहार का अध्ययन किया जा सकेगा। वनभैंस लंबे समय तक पानी में रहते हैं, इसलिए उनके रहवास क्षेत्र में कई जलाशय बनाए जाएंगे। प्रयोग नहीं, प्राकृतिक झुंड बचाने पर जोर: पिछले प्रयासों में बाहर से वनभैंस लाने और क्लोन तैयार करने पर जोर था। नई योजना में पहले से मौजूद प्योर नस्ल के प्राकृतिक झुंड और उसके रहवास को सुरक्षित किया जाएगा। महाराष्ट्र-ओडिशा को भी जोड़ा| झुंड महाराष्ट्र सीमा से लगे नदी किनारे के इलाके में है। विभाग उन रास्तों की पहचान कर रहा है, जहां से वनभैंस सीमा पार जा सकते हैं। ऐसे संवेदनशील रास्तों को सुरक्षित किया जाएगा। इंद्रावती टाइगर रिजर्व के नजदीक महाराष्ट्र और ओडिशा की सीमाएं होने के कारण दोनों राज्यों को भी योजना में शामिल किया गया है। संरक्षण योजना को मंजूरी मिलने के बाद काम शुरू कर दिया गया है। जरूरत पड़ने पर आसपास के गांवों के लोगों की भी मदद ली जाएगी। -ओपी यादव, पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ
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