विजयादशमी के अवसर पर मनेंद्रगढ़ में सिंदूर खेला का आयोजन किया गया। शहर में चार ऐसे दुर्गा पंडाल हैं, जहां बंगाली परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ होती है। यह रस्म मां दुर्गा की विदाई के समय निभाई जाती है।
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मान्यता है कि सिंदूर खेला उत्सव की शुरुआत लगभग 450 वर्ष पहले हुई थी। इसके बाद पश्चिम बंगाल में दुर्गा विसर्जन के दिन सिंदूर खेला मनाने की परंपरा शुरू हुई। इसे सिंदूर उत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

जानिए क्या है मान्यता
मान्यताओं के अनुसार, शारदीय नवरात्र के दौरान मां दुर्गा 10 दिनों के लिए अपने मायके आती हैं, जिसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के अंतिम दिन सिंदूर खेला का आयोजन होता है। लोगों का मानना है कि सिंदूर खेला से सुहागिनों के सुहाग की रक्षा होती है और घरों में खुशहाली बनी रहती है।

आरती के साथ सिंदूर खेला की शुरुआत
पंडाल के पुजारी बापी महाराज ने बताया कि दुर्गा विसर्जन के दिन आरती के साथ सिंदूर खेला की शुरुआत होती है। इसके बाद भक्त मां दुर्गा को भोग अर्पित करते हैं और लोगों में प्रसाद का वितरण किया जाता है। मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने एक शीशा रखा जाता है।
जिसमें माता के चरणों के दर्शन होते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इसके बाद सिंदूर खेला शुरू होता है, जहां महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं। अंत में दुर्गा विसर्जन किया जाता है।
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