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सरगुजा जिले के मैनपाट के जामपहाड़ क्षेत्र में पहाड़ी कोरवा परिवारों के 9 बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया गया है। 10 से 12 वर्ष की उम्र होने के बाद भी ये आज तक स्कूल नहीं जा पाए थे।
इससे शिक्षा विभाग द्वारा हर साल करने वाले सर्वे व आदिम जाति कल्याण विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों पर सवाल भी उठ रहे हैं। कलेक्टर भोसकर संदीपन पिछले दिनों इस क्षेत्र में भ्रमण पर पहुंचे तो जंगल में खेल रहे कुछ पहाड़ी कोरवा बच्चों पर उनकी नजर पड़ गई। पूछताछ में पता चला वे स्कूल जाते ही नहीं है और ना ही घर वाले इसके बारे में कभी सोंचे। बात निकलकर ये आई कि हाथी प्रभावित क्षेत्र होने व इस इलाके से स्कूल की दूरी करीब 3 किमी है।
इससे परिजन डर की वजह से इन्हें स्कूल नहीं जाते हैं। फिर कलेक्टर ने शिक्षा विभाग को इस इलाके में सर्वे करने निर्देश दिए तो पहाड़ी कोरवा समुदाय के 8 बालिकाएं और 1 बालक ऐसे मिले, जो आज तक स्कूल गए ही नहीं थे। इनकी उम्र 10 साल से ज्यादा हो गई थी। फिर इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पहल की गई। डीईओ डॉक्टर दिनेश कुमार झा के निर्देशन में संकुल समन्वयक और शिक्षकों की एक टीम बनाई गई।
टीम ने लगातार दो दिनों तक दुर्गम पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए विभिन्न कोरवा बसाहटों का सर्वे किया। इस दौरान सारुजोबा, घोराघाट, जाम पहाड़, कोरवापारा और बोदार जैसे गांवों व टोला-टपरी तक पहुंचकर बच्चों की जानकारी जुटाई। जिला शिक्षा अधिकारी डॉक्टर दिनेश कुमार झा ने कहा कि दुर्गम इलाकों में जाकर बच्चों को ढूंढना और उनके परिवारों को शिक्षा के महत्व के लिए राज़ी करना आसान नहीं था, लेकिन हमारे शिक्षकों ने समर्पण और धैर्य के साथ यह काम किया। यह उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज नौ बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ पाए हैं। उन्होंने सभी शिक्षकों को निर्देश दिए हैं कि स्कूल जाने योग्य 6 से 14 वर्ष के बच्चों को स्कूल से जोड़ने प्रयास करें।
उम्र के अनुसार अलग अलग कक्षा में प्रवेश स्कूल से जिन बच्चों को जोड़ा गया है, उनमें राखी पिता शिवकुमार, कुमारी पिता मोहन, सुमारी पिता मंगलसाय, रवीना पिता मोहन, सुमंती पिता मंगलसाय, ज्ञान पिता मंगलसाय, सुखनी पिता मंगलू वनवासी, जीवंती पिता ठुना व अमिता पिता मधुबन शामिल हैं। चूंकि इनकी उम्र 8 से 12 साल के बीच है, इसलिए इन्हें उम्र के अनुसार अलग-अलग कक्षा में प्रवेश दिया गया है। इन बच्चों को पहले से पढ़ाई कर रहे छात्रों के बराबर लाना भी एक चैलेंज है।
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