डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस की FIR और चार्जशीट को हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में अपोलो हॉस्पिटल चार डॉक्टरों को बड़ी राहत दी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने बहुचर्चित गोल्डी छाबड़ा डेथ केस में डॉक्टरों की याचिका पर सुनवाई की। जिसके बाद पुलिस की एफआईआर
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दयालबंद के आदर्श कॉलोनी निवासी गोल्डी उर्फ गुरवीन छाबड़ा (29) को 25 दिसंबर 2016 को पेट में दर्द हुआ। जिस पर परिजन इलाज के लिए उसे अपोलो अस्पताल ले गए। दूसरे दिन 26 दिसंबर को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही से मौत के आरोप लगाए और सिटी कोतवाली पुलिस से शिकायत की, जिस पर 27 दिसंबर को पोस्टमॉर्टम हुआ, लेकिन विसरा को 31 जनवरी 2019 को रासायनिक परीक्षण के लिए भेजा गया था, 5 मार्च 2019 रिपोर्ट मिली। इसमें किसी भी तरह के सल्फास के अवशेष नहीं मिले।

अपोलो अस्पताल में इलाज के दौरान युवक की हुई थी मौत।
हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस ने दर्ज किया केस इस मामले में परिजनों ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। लेकिन, पुलिस ने जांच के बाद कोई कार्रवाई नहीं की। इससे परेशान परिजन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। बाद में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकंडा थाने में डॉ. सुनील कुमार केडिया, डॉ. देवेंद्र सिंह, डॉ. राजीव लोचन भांजा और मनोज कुमार राय के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
पुलिस की एफआईआर को दी चुनौती, बताया गंभीर हालत में था मरीज इस मामले में पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए चारों डॉक्टर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं की तरफ से बताया गया कि 25 दिसंबर 2016 को मरीज को गंभीर हालत में भर्ती कराया गया था। मरीज मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर के कारण अगले ही दिन 26 दिसंबर को निधन हो गया। इस मामले में पहले सिम्स और बाद में राज्य मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था। कार्डियोलॉजिस्ट समेत पांच मेडिकल विशेषज्ञों वाले इस राज्य मेडिकल बोर्ड ने वर्ष 2023 में अपनी राय दी थी कि डॉक्टरों की ओर से कोई लापरवाही नहीं हुई है।
मेडिको लीगल एक्सपर्ट की रिपोर्ट के आधार पर केस यह भी बताया कि बोर्ड की रिपोर्ट के बावजूद पुलिस विभाग के एक मेडिको लीगल विशेषज्ञ की रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया था। इस रिपोर्ट में मृत्युपूर्व बयान रिकॉर्ड न करना या राइस ट्यूब को संरक्षित न करना का उल्लेख किया गया था, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि इन कमियों का मरीज की मौत से कोई सीधा कारण और प्रभाव संबंध था। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि केवल ऐसी तकनीकी टिप्पणियों के आधार पर आपराधिक लापरवाही का मामला बनाना उचित नहीं है। इसलिए अदालत ने डाक्टरों के खिलाफ दर्ज एफआइआर और निचली अदालत में दाखिल चार्जशीट दोनों को निरस्त कर दिया है।
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