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प्रशांत गुप्ता/अमिताभ अरुण दुबे की रिपोर्ट
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छत्तीसगढ़ में संचालित एनजीओ राज्य श्रोत (नि:शक्तजन) संस्थान (एसआरसी) ने सुनियोजित षड्यंत्र से करोड़ों रुपए का गबन किया। 14 साल तक बिना रोक-टोक के समाज कल्याण विभाग के अफसरों ने वृद्धा पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, केंद्रीय सहायता अनुदान और राष्ट्रीय पुनर्वास योजना के 1-2 नहीं बल्कि सैंकड़ों, करोड़ों रुपए एसआरसी के खाते में ट्रांसफर किए। इस एनजीओ पर इसलिए भी किसी ने अंगुली नहीं उठाई, क्योंकि तत्कालीन मंत्री, 2 मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव खुद इसके सदस्य थे।
2018 में एसआरसी की एक अन्य शाखा पीआरआरसी के ग्रेड3 कर्मचारी कुंदन ठाकुर ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई तो फिर जांच पर जांच, जवाब-तलब और नोटिस जारी हुए। अब सब सीबीआई जांच के लपेटे में हैं। उधर, इस मामले के फूटने के बाद 2019 में विभाग के तत्कालीन विशेष सचिव आर. प्रसन्ना ने एसआरसी के कार्यकारी निदेशक राजेश तिवारी (13 साल तक पद पर रहे) को नोटिस जारी किया था।
लिखा- आपके द्वारा संचालनालय में कोई नस्ती प्रस्तुत नहीं की गई। आपके द्वारा स्वेच्छाचारिता से संस्था का संचालन करते हुए कोई भी नस्ती विभागीय अधिकारियों के माध्यम से मंत्री को प्रस्तुत नहीं की गई। यह कृत्य घोर लापरवाही का है। राजेश तिवारी वही अधिकारी थे, जिन्हें एचआरसी की प्रबंध कारिणी ने निदेशक बनाया था। या यूं कहें कि तिवारी को नियम-विरुद्ध काम करने की खुली झूठ थी। इनके जरिए षड्यंत्र के तहत करोड़ों की हेराफेरी की गई।
एसआरसी निदेशकों को नोटिस
सितंबर 2018- राजेश तिवारी, ओएसडी समाज कल्याण विभाग एवं कार्यकारी निदेशक एसआरसी (2005-07, 2007-14 तक)
- एसआरसी के उद्देश्यों की पूर्ति 14 साल में नहीं की। कैशबुक, स्टॉक पंजीयन, आपके कार्यकाल में वित्तीय संबंधी नस्तियों का संधारण नहीं किया। अनियमित रूप से एसबीआई में खाता खोला। 1.35 करोड़ की गड़बड़ी।
- राजेश तिवारी की फरवरी 1990 में बिलासपुर पुनर्वास केंद्र में 6 महीने के लिए तदर्थ नियुक्ति हुई थी। इसी पद पर मध्यप्रदेश समाज कल्याण विभाग ने मार्च 1993 को संविदा नियुक्ति दे दी। छत्तीसगढ़ गठन के बाद तिवारी को रायपुर विभागीय संचालनालय में नियुक्ति मिल गई। विभागीय अधिकारियों ने इनकी संविदा नियुक्ति को वर्षों तक छिपाकर रखा और जून 2009 में मंत्रिपरिषद से इन्हें नियमित कर दिया गया। जून 2022 में सेवा समाप्ति के समय कुल 13 साल की सेवा हुई, लेकिन इन्हें पेंशन 1990 से यानी कुल 32 साल की मिली।
- पंकज वर्मा, कार्यकारी निदेशक, एसआरसी- 2 साल का ऑडिट नहीं करवाया। आपत्तियों का उत्तर नहीं दिया। कैशबुक मेंटेन नहीं की।
- हेरमन खलखो, तत्कालीन कार्यकारी निदेशक एसआरसी- 10.80 करोड़ की गड़बड़ी के आरोप।
(नोट- 2019 में समाज कल्याण विभाग के तत्कालीन विशेष सचिव आर. प्रसन्ना ने तीनों अधिकारियों को नोटिस दिया।)
इस प्रकार पैसा एसआरसी में ट्रांसफर होता था
त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय सहायता, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण, ग्राम पंचायतों को सहायता, अतिरिक्त केंद्रीय सहायता, राष्ट्रीय वृद्धापेंशन सहायता अनुदान, अन्य अनुदान की राशि।
फरवरी 2011- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धापेंशन योजना के 3.85 करोड़ एसआरसी को जारी हुए। जून 2012- 29.85 लाख रु. एसआरसी को जारी हुए। अप्रैल 2014- 1.29 करोड़ रु. एसआरसी को दी गई। अप्रैल 2015- 3.12करोड़ रु. एसआरसी को दिए गए। अप्रैल 2016- 2.82 करोड़ रुपए एसआरसी को ट्रांसफर हुए।
एसआरसी में 29 लाख, 20 लाख, 7 लाख, 8.94 लाख, 8 लाख, 8.25 लाख, 5.5 लाख, 4 लाख जैसी अन्य मदों की राशि भी ट्रांसफर हुई।
(नोट- ये राशि समाज कल्याण विभाग से शासकीय दृष्टिबाधित एवं श्रवण बाधितार्थ विद्यालय और वहां से एसआरसी को जारी होती रही।)
14 साल का ऑडिट एक साथ करवाया
शिकायतें मिलने पर मई 2018 में समाज कल्याण विभाग के तत्कालीन सचिव आर. प्रसन्ना ने एसआरसी के निदेशक रहे राजेश तिवारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इन्होंने 14 साल का एक साथ ऑडिट करवाया, जबकि ऑडिट हर साल होना अनिवार्य है। इस लापरवाही पर जांच के आदेश हुए।
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