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Chhattisgarh High Court Slams Bilaspur Police on NDPS Case Investigation


बिलासपुर3 मिनट पहले

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महिला को एनडीपीएस के केस में फंसाने का है आरोप। - Dainik Bhaskar

महिला को एनडीपीएस के केस में फंसाने का है आरोप।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने बिलासपुर पुलिस की एनडीपीएस एक्ट के तहत की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सरकंडा थाना क्षेत्र में प्रतिबंधित नशीली टेबलेट की बरामदगी और जांच प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने DGP से व्यक्तिगत शपथपत्र के साथ जवाब मांगा है। कोर्ट ने खासकर यह बताने को कहा है कि जिस ASI ने मामले में FIR दर्ज की, उसे ही जांच अधिकारी कैसे नियुक्त कर दिया गया। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को लेकर पुलिस से जवाब तलब किया है।

पुलिस ने महिला के घर दबिश देकर 2925 क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट जब्त करने का दावा किया था। (फाइल फोटो)

पुलिस ने महिला के घर दबिश देकर 2925 क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट जब्त करने का दावा किया था। (फाइल फोटो)

महिला के घर से 2925 नशीली टेबलेट जब्त

दरअसल, सरकंडा थाना क्षेत्र के बंधवापारा में पुलिस ने महिला के घर दबिश देकर 2925 क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट जब्त करने का दावा किया था। पुलिस ने टेबलेट को प्रतिबंधित और नशीला पदार्थ बताते हुए महिला के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया और उसे जेल भेज दिया।

महिला करीब सात महीने से जेल में बंद है। इस दौरान उसकी बच्ची और परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

भाई ने पुलिस पर साजिश का लगाया आरोप

महिला के भाई ने आरोप लगाया है कि उसकी बहन को सरकंडा पुलिस और उसके बहनोई रामकिशोर ने कथित तौर पर साजिश के तहत फंसाया है। उसने मामले में ASI शैलेंद्र सिंह की मिलीभगत का भी आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

छत पर मिला था दवाओं से भरा पॉलीथिन

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि जिस पॉलीथिन बैग से कथित प्रतिबंधित दवाएं बरामद हुईं, वह महिला के पास से सीधे नहीं मिला था। परिवार के मुताबिक, करीब 14 साल के बच्चे को पतंग उड़ाते समय यह बैग घर की छत पर मिला था। बच्चे ने मोबाइल पर दवाओं के बारे में जानकारी जुटाई और इसकी जानकारी अपनी मां को दी।

परिवार का कहना है कि बैग को अनचाही वस्तु समझकर सीढ़ियों के पास कचरे की तरह रख दिया गया था। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए महिला को मामले में आरोपी बना दिया।

हाईकोर्ट ने सरकंडा थाना पुलिस के प्रतिबंधित नशीली टेबलेट की बरामदगी और जांच प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है। (फाइल फोटो)

हाईकोर्ट ने सरकंडा थाना पुलिस के प्रतिबंधित नशीली टेबलेट की बरामदगी और जांच प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है। (फाइल फोटो)

नाबालिग को 10 घंटे थाने में बैठाने का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में बताया कि 14 साल के बच्चे के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं थी। इसके बावजूद पुलिस उसे थाने ले गई और करीब 10 घंटे तक वहां बैठाकर रखा गया। याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

बैग छत तक कैसे पहुंचा, जांच की मांग

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पुलिस यह पता लगाए कि दवाओं से भरा बैग आखिर छत तक कैसे पहुंचा और उसे वहां किसने रखा था। इसके अलावा दवाओं के वास्तविक स्रोत और महिला की गिरफ्तारी किन परिस्थितियों में हुई, इसकी भी जांच की मांग की गई है। याचिका में बच्चे के मोबाइल को फोरेंसिक जांच के लिए मुहैया कराने की बात भी कही गई है।

हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि जिस पुलिस अधिकारी शैलेंद्र सिंह ने कथित तौर पर देहाती नालिश दर्ज की और जिसके आधार पर FIR दर्ज हुई, उसी अधिकारी को मामले की जांच कैसे सौंप दी गई।

कोर्ट के सामने यह भी बताया गया कि इसी अधिकारी ने जांच पूरी करने के बाद महिला के खिलाफ चार्जशीट भी पेश की है। हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को लेकर DGP से जवाब मांगा है।

डिवीजन बेंच ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। (फाइल फोटो)

डिवीजन बेंच ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। (फाइल फोटो)

ASI के पुराने रिकॉर्ड की भी मांगी जानकारी

डिवीजन बेंच ने DGP को इस मामले के जांच अधिकारी ASI शैलेंद्र सिंह के पिछले आचरण और रिकॉर्ड की जानकारी भी पेश करने का निर्देश दिया है। इससे पुलिस की भूमिका और जांच की निष्पक्षता को लेकर उठे सवाल और गंभीर हो गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी। इसमें DGP के शपथपत्र के बाद हाईकोर्ट आगे का रुख तय करेगा।

क्या होती है देहाती नालिश?

देहाती नालिश अपराध स्थल या थाने पहुंचने से पहले पीड़ित या गवाह की ओर से पुलिस अधिकारी को दी गई शुरुआती सूचना या बयान होता है। इसी के आधार पर आगे FIR दर्ज की जा सकती है। ऐसे में शिकायत दर्ज करने वाले अधिकारी को ही जांच की जिम्मेदारी दिए जाने पर हाईकोर्ट का सवाल जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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