जगदलपुर में बुधवार की रात रथ परिक्रमा को लेकर प्रशासन और पटेल समाज के बीच जमकर विवाद हुआ। समाज का कहना है कि राज परिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और उनकी पत्नी को मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ रथ पर बिठाया जाए। करीब 60 साल पुरानी परंपरा फिर से शुरू की जा
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यही वजह रही की नवरात्र के तीसरे दिन से शुरू होने वाले फूल रथ की परिक्रमा में देरी हुई। देर रात तक इसपर विवाद चलता रहा। समाज ने रथ खींचने से मना कर दिया था। हालांकि, राज परिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव की समझाइश के बाद रात 11 बजे के बाद रथ की परिक्रमा करवाई गई। 617 साल पुरानी परंपरा निभाई गई।

रात में विवाद चलता रहा।
कमलचंद भंजदेव ने कहा कि, माई जी के सम्मान में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इसलिए आप रथ की परिक्रमा करवाइए। वहीं ग्रामीण कहते रहे जब तक आप नहीं बैठेंगे रथ को नहीं खींचेंगे।

बस्तर दशहरा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि परिक्रमा देरी से हुई। रथ की परिक्रमा से पहले ही रथ खींचने वालों ने प्रशासन को चेता दिया था कि कमलचंद भंजदेव और उनकी पत्नी जब तक रथ पर नहीं बैठेंगी रथ नहीं खींचा जाएगा। हालांकि, रात में समझाइश के बाद किलेपाल इलाके के ग्रामीणों ने रथ को खींचा।

साथ ही दोबारा चेताया है कि अब आने वाले दिनों में यदि रथारूढ़ नहीं होते हैं तो रथ नहीं खींचा जाएगा। इधर, जगदलपुर तहसीलदार का कहना है कि यह शासन स्तर का मामला है। हमने मामला आगे भेज दिया है। वहीं से निर्णय लिया जाएगा।

60 साल पहले राजा-रानी बैठे थे
दरअसल, देश में राजशाही प्रथा समाप्त हो गई है। बस्तर में जिस रथ की परिक्रमा करवाई जाती है उसमें 60 साल पहले मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ राज और रानी बैठते थे। सिर्फ किलेपाल इलाके के ग्रामीण ही रथ को खींचते हैं। वहीं, अब लोग दोबारा इस प्रथा को शुरू करने की मांग कर रहे हैं।
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