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सरकारी योजनाओं में गड़बड़ियों पर नजर रखने वाली राज्य की सामाजिक अंकेक्षण इकाई (सोशल ऑडिट यूनिट) खुद कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रही है। स्थिति यह है कि इकाई के 586 स्वीकृत पदों में से 274 पद खाली हैं। यानी करीब 47% पद रिक्त हैं। इसके बावजूद अब इस इकाई को समाज कल्याण विभाग की पेंशन योजनाओं और समग्र शिक्षा के सामाजिक अंकेक्षण की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी सौंप दी गई है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के लेखा परीक्षण नियम-2011 के तहत गठित इस स्वतंत्र एवं स्वशासी इकाई का गठन सितंबर 2013 में किया गया था। शुरुआत में इसका दायरा केवल मनरेगा तक सीमित था। बाद में प्रधानमंत्री आवास योजना और स्कूलों की पीएम पोषण (मध्याह्न भोजन) योजना का सोशल ऑडिट भी इसी संस्था को सौंपा गया। अब पेंशन योजनाएं और समग्र शिक्षा भी इसके दायरे में शामिल हो गई हैं। सामाजिक अंकेक्षण के दौरान योजनाओं के कार्यों का भौतिक सत्यापन, दस्तावेजों का मिलान, हितग्राहियों से मौखिक सत्यापन और जनसुनवाई के माध्यम से वित्तीय गड़बड़ी, प्रक्रिया के उल्लंघन तथा अन्य अनियमितताओं की जांच की जाती है। कर्मचारियों की कमी के कारण मनरेगा के तहत हुए सभी कार्यों का भी समय पर सामाजिक अंकेक्षण नहीं हो पा रहा है। सबसे अधिक रिक्तियां विलेज सोशल ऑडिटर और ब्लॉक सोशल ऑडिटर के पदों पर हैं, जो फील्ड में जाकर जांच की मुख्य जिम्मेदारी निभाते हैं। बताया जा रहा है कि वर्ष 2017 के बाद इस इकाई में नियमित भर्ती नहीं हुई है।
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