छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला अस्पताल में 1 यूनिट ब्लड नहीं मिलने से सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित युवती की मौत हो गई। इस लापरवाही के लिए स्वास्थ्य विभाग ने 2 डॉक्टरों समेत 7 लोगों पर कार्रवाई की है। 4 स्टाफ को नौकरी से निकाल दिया गया है।
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जांच रिपोर्ट में बात सामने आई है कि, फीमेल वार्ड से ब्लड बैंक की दूरी 30-40 कदम थी। 85 यूनिट खून उपलब्ध था। इसके बावजूद ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ ने खुद ब्लड बैंक जाकर मरीज के लिए खून लाने की कोई कोशिश नहीं की। डोनर नहीं होने की जानकारी सीनियर अधिकारियों को नहीं दी, जिससे युवती की जान चली गई। वहीं, 2 डॉक्टरों पर भी निगरानी और इलाज में लापरवाही के आरोप हैं।
पहले जानिए किसने क्या लापरवाही की

जानिए क्या था पूरा मामला
दीपिका गाड़ा (20) भिलाई के मरोदा इलाके की रहने वाली थी। वह सिकल सेल एनीमिया की मरीज थी और कई दिनों से बीमार चल रही थी। परिजनों के मुताबिक, उसके हाथ-पैर, कमर और पूरे शरीर में तेज दर्द था।
30 मई की रात करीब 11 बजे उसकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। इसके बाद उसे एम्बुलेंस से जिला अस्पताल लाया गया। जांच में डॉक्टरों ने बताया कि शरीर में खून की मात्रा बहुत कम है और तुरंत ब्लड चढ़ाने की जरूरत है।

बेटी की मौत के बाद अस्पताल के गेट के सामने रोती रही मां।
डोनर नहीं ला सका परिवार
परिजनों का आरोप है कि, अस्पताल ने 3 यूनिट ब्लड की व्यवस्था करने के लिए कहा। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और वे तुरंत डोनर नहीं ला सके। उन्होंने अस्पताल और ब्लड बैंक से कम से कम एक यूनिट खून देने की गुहार लगाई ताकि इलाज शुरू हो सके, लेकिन उन्हें खून नहीं दिया गया।
परिजनों का कहना है कि उन्होंने कई बार अस्पताल कर्मचारियों से मदद मांगी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। इलाज के दौरान 1 जून को दीपिका की मौत हो गई।

सिर्फ 5.5 ग्राम था हीमोग्लोबिन
दीपिका की मां के मुताबिक डॉक्टरों ने बताया था कि उसकी ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन करीब 5.5 ग्राम था। परिवार ने अस्पताल से अनुरोध किया था कि पहले एक यूनिट खून दे दिया जाए और बाकी की व्यवस्था बाद में कर ली जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने कहा था कि ऐसी आपात स्थिति में यदि मरीज के परिजन तुरंत डोनर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो हालात को देखते हुए 1-2 यूनिट ब्लड दिया जा सकता था। इस मामले की जांच के लिए जिला प्रशासन ने जांच कमेटी बनाई।

दीपिका गाड़ा (20) सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित थी।
जांच रिपोर्ट में लापरवाही आई सामने
कलेक्टर अभिजीत सिंह की ओर से बनाई गई 2 सदस्यीय जांच टीम ने करीब 7 दिन तक इस पूरे मामले की जांच की। रिपोर्ट में यह सामने आया है कि इलाज करने और खून (ब्लड) उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में कई जगहों पर गंभीर लापरवाही हुई है। इसके बाद 9 स्टाफ पर सीधे तौर से जिम्मेदारी तय की गई और उन्हें नोटिस भेजा गया था।

मौत के बाद मृतका की डेडबॉडी, शव वाहन से ले जाया गया।
25 दिन बाद विभाग ने की कार्रवाई
इस मामले में 25 दिन बाद स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई की है। जांच के बाद 2 डॉक्टर समेत कुल 7 कर्मचारियों को जिम्मेदार माना गया है। इनमें 4 संविदा कर्मचारियों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी गई हैं, जबकि 3 नियमित और संविदा कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए उनके संबंधित विभाग को पत्र भेजा गया है।
4 संविदा कर्मचारियों को नौकरी से निकाला
जिला कलेक्टर अभिजीत सिंह के अनुसार, रेडक्रॉस सोसायटी से नियुक्त लैब टेक्नीशियन तरन्नुम जहां और निगार परवीन की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। साथ ही एनएचएम की स्टाफ नर्स जागेश्वरी देवी और तनुजा चंद्राकर को भी नौकरी से हटा दिया गया है।
इसके अलावा नियमित स्टाफ नर्स अनसतसिया केरकेट्टा, पीजी रेजिडेंट डॉक्टर निखिल अग्रवाल और एनएचएम की विशेषज्ञ डॉक्टर डॉ. तृप्ति तिवारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उनके नियुक्तिकर्ता को पत्र भेजा गया है।
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