.
राकेश जायसवाल | कवर्धा
नगर पंचायत पिपरिया में स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना देखने को मिल रही है। यहां 2.50 करोड़ रुपए का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) मंजूर है, लेकिन अस्पताल भवन बनाने के लिए 1 एकड़ जमीन नहीं मिल पा रही है। नतीजा यह है कि वर्ष 2011 में सीएचसी का दर्जा मिलने के बावजूद 15 साल बाद भी अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) की सीमाओं में कैद है।
यहां गंभीर मरीजों को आज भी इलाज के लिए 20 किलोमीटर दूर कवर्धा भेजना पड़ रहा है। विडंबना देखिए.. सरकार ने बजट दे दिया। भवन बनाने की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन (सीजीएमएससी) को सौंप दी। लेकिन प्रशासन जेब में बजट लेकर अब तक सिर्फ जमीन तलाशने में जुटा है। यानी अस्पताल बनने से पहले ही फाइलें बीमार पड़ गई हैं। पिपरिया और आसपास के 50 से अधिक गांवों के लिए यह अस्पताल जीवनरेखा साबित हो सकता था। लेकिन जमीन की तलाश में स्वास्थ्य व्यवस्था चौपट है।
शुरुआत में नगर पंचायत के पास स्थित माध्यमिक स्कूल भवन को तोड़कर वहां अस्पताल बनाने की योजना बनी थी। इंजीनियरों ने निरीक्षण किया, तो बिल्डिंग को डिस्मेंटल योग्य नहीं माना। योजना वहीं रुक गई। अब प्रशासन की नजर बिजली सब-स्टेशन के पास मंडी बोर्ड की 6 एकड़ जमीन पर है। इसमें से सिर्फ 1 एकड़ भूमि अस्पताल के लिए मांगी गई है। मंजूरी अब तक नहीं मिली है।
बीएमओ और पीएचसी पिपरिया प्रभारी डॉ. विनोद चंद्रवंशी का कहना है कि सीएचसी भवन के लिए जमीन नहीं मिल रही है। मंडी बोर्ड की 6 एकड़ भूमि में से 1 एकड़ हैंडओवर कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। अभी पीएचसी भवन में ही मरीजों को सेवाएं दी जा रही है।
यहां हर दिन औसतन 150 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। हर महीने 30 से ज्यादा प्रसव होते हैं और पिछले साल 2500 महिलाओं की नसबंदी यहीं हुई। सुविधाओं की कमी के कारण हर महीने करीब 25 गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल कवर्धा रेफर करना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी मानते हैं कि नई बिल्डिंग के बिना सुविधाओं का विस्तार संभव नहीं है।
पिपरिया और आसपास के 50 से अधिक गांवों की आबादी इस अस्पताल पर निर्भर है। लेकिन सुविधाओं की हालत यह है कि ओपीडी अलग कमरे में है। एक्स-रे रूम दूसरी तरफ, लैब कहीं और है, तो फिजियोथैरेपी अलग। मरीजों का वेटिंग एरिया भी तंग है। एक ही परिसर में सब कुछ है, लेकिन बिखरा हुआ है। ऐसे में मरीजों और परिजनों को प रेशान होना पड़ता है।
<
