नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। आस्था का प्रमुख केंद्र रतनपुर स्थित आदिशक्ति मां महामाया मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। करोड़ों रुपये की वार्षिक आय, नवरात्र में भव्य आयोजन और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच मंदिर में सेवा दे रहे गुमास्ता पुजारियों के मानदेय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि ट्रस्ट प्रबंधन का कहना है कि मंदिर व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक दायित्वों को संतुलित रखते हुए सभी निर्णय नियमानुसार लिए जाते हैं। 11वीं शताब्दी में कलचुरी शासक रत्नदेव प्रथम द्वारा निर्मित रतनपुर का मां महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान माना जाता है।
शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर में प्रमुख गुमास्ता पुजारी अरुण शर्मा सहित राममूर्ति मिश्रा, शशि मिश्रा, आनंद मिश्रा और कृष्णकांत मिश्रा वर्षों से पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। जानकारी के अनुसार ट्रस्ट बैठक में तय मानदेय के आधार पर पुजारियों को प्रतिमाह निश्चित राशि प्रदान की जाती है, हालांकि इसकी अधिकृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। स्थानीय स्तर पर इसे पांच से 10 हजार रुपये प्रतिमाह के बीच माना जाता है। मंदिर की आय में दान पेटी, ज्योति कलश, दुकानों का किराया और धार्मिक आयोजनों से प्राप्त राशि शामिल है। नवरात्र के दौरान मंदिर में करोड़ों रुपये का खर्च भी किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
मंदिरों में सेवा देने वाले पुजारियों और कर्मचारियों के मानदेय को लेकर देशभर में समय-समय पर बहस होती रही है। हाल के वर्षों में धार्मिक संस्थानों में कार्यरत पुजारियों के न्यूनतम वेतन और श्रम अधिकारों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। याचिकाओं में कहा गया था कि मंदिरों में वर्षों से सेवा दे रहे पुजारियों को सम्मानजनक मानदेय मिलना चाहिए। इस बहस के बाद कई ट्रस्टों की व्यवस्थाएं चर्चा में आई थीं।
ज्योति कलश व दान से व्यवस्था
मां महामाया मंदिर में नवरात्र के दौरान हजारों ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। मंदिर ट्रस्ट की आय में इसका बड़ा योगदान माना जाता है। इसके अलावा दान पेटी, दुकानों का किराया, धार्मिक अनुष्ठान और श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए स्वर्ण-रजत आभूषण भी ट्रस्ट की आय का हिस्सा हैं। ट्रस्ट का दावा है कि इसी राशि से मंदिर का रखरखाव, सुरक्षा, भव्य आयोजन और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाता है।
पूजा करने मात्र से चढ़ावा पुजारी की संपत्ति नहीं: हाई कोर्ट
जनवरी 2019 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि किसी पुजारी द्वारा मंदिर में पूजा-अर्चना करने मात्र से चढ़ावे की सामग्री स्वतः उसकी निजी संपत्ति नहीं हो जाती। जस्टिस गौतम भादुड़ी की सिंगल बेंच ने मुंगेली जिले के टिंगीपुर स्थित प्राचीन मंदिर मामले में यह निर्णय दिया। कोर्ट ने मंदिर ट्रस्ट व्यवस्था को सही ठहराते हुए कहा कि मंदिर की आय, चढ़ावा और ज्योति कलश की राशि का पारदर्शी हिसाब रखा जाए। साथ ही पुजारियों को नियमित वेतन और चढ़ावे से 10 प्रतिशत राशि देने का निर्देश भी दिया गया। कोर्ट ने जोगी परिवार को पूजा जारी रखने की अनुमति देते हुए ट्रस्ट संचालन व्यवस्था बरकरार रखी।
मां डिडनेश्वरी व चंद्रहासिनी मंदिर में आस्था बड़ी, मानदेय छोटा
मल्हार स्थित मां डिडनेश्वरी मंदिर और रायगढ़ जिले के प्रसिद्ध मां चंद्रहासिनी मंदिर में भी पुजारियों के मानदेय की स्थिति लगभग समान है। मां डिडनेश्वरी मंदिर में राजकुमार चौबे, कमल अवस्थी और गणेश वैष्णव को मानदेय के रूप में मात्र 1600 से 2100 रुपये प्रतिमाह दिए जाते हैं, जबकि मंदिर को दान से सालाना लगभग 25 लाख रुपये की आय होती है। वहीं मां चंद्रहासिनी मंदिर के मुख्य पुजारी को प्रतिमाह 9000 रुपये मानदेय मिलता है। ट्रस्टी सुनील देवांगन के अनुसार इसमें हर वर्ष 10 प्रतिशत वृद्धि की जाती है। हालांकि मंदिर की वार्षिक आय सार्वजनिक नहीं की गई है।
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आस्था और परंपरा का दायित्व भी है
मंदिर केवल आय का केंद्र नहीं, आस्था और परंपरा का दायित्व भी है। उनके अनुसार ट्रस्ट द्वारा धार्मिक व्यवस्थाओं, सुरक्षा, भंडारा, सौंदर्यीकरण और कर्मचारियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर संतुलित तरीके से निर्णय लिए जाते हैं। हमारे यहां पांच गुमास्ता पुजारी है, जिन्हें ट्रस्ट द्वारा निर्धारित मानदेय नियमित रूप से दिया जाता है। आशीष सिंह ठाकुर,अध्यक्षआदिशक्ति मां माहामाया मंदिर ट्रस्ट रतनपुर।
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