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Home » प्रकृति, संस्कृति और शिक्षा ज्यादा मायने रखते हैं
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प्रकृति, संस्कृति और शिक्षा ज्यादा मायने रखते हैं

By adminMay 25, 2026No Comments3 Mins Read
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अनुज नाहरिया | कोंडागांव आधुनिकता की अंधी दौड़ और फास्ट फूड के बढ़ते चलन के बीच आज छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की पारंपरिक जीवनशैली और खानपान को एक नई पहचान मिल रही है। फरसगांव की रहने वाली 45 वर्षीय सीमा मंडावी इस बदलाव का एक बड़ा चेहरा बनकर उभरी हैं। 12वीं तक पढ़ी सीमा अपनी आत्मनिर्भर सोच, शुद्ध पारंपरिक व्यंजनों और प्राकृतिक जीवनशैली के जरिए न सिर्फ बस्तरिया संस्कृति को सहेज रही हैं, बल्कि क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। आज जब लोग पैकेज्ड फूड और बाजार की मिलावटी चीजों की ओर भाग रहे हैं, तब सीमा मंडावी लोगों को बस्तर के पारंपरिक स्वाद और उसकी पौष्टिकता से दोबारा जोड़ रही हैं। उनके पास आने वाले लोग तीखुर शरबत, तीखुर बर्फी, मंडिया (रागी) पेज और पारंपरिक पान रोटी जैसे शुद्ध देशी स्वादों का आनंद लेते हैं। उनकी बनाई पान रोटी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इसे बेहद अनूठे और पारंपरिक तरीके से केले के पत्ते में चावल के आटे की परत लगाकर तैयार किया जाता है, जिसके अंदर कद्दूकस किया हुआ नारियल, गुड़ और इलायची भरकर स्टीम किया जाता है। यह व्यंजन बस्तरिया संस्कृति की मिठास को जीवंत रखता है। सीमा कहती हैं, जीवन में पहले प्रकृति, फिर संस्कृति और उसके बाद शिक्षा का स्थान है। शुद्ध और प्राकृतिक भोजन ही अच्छे स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुंजी है।
सीमा ने बताया कि वर्तमान समय में लोग गाय पालने से हिचकिचाते हैं, लेकिन एक गाय परिवार के चार सदस्यों का पेट पालती है। उन्होंने बताया कि शुद्धता को बनाए रखने के लिए वे बाजार के दूध पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि अपने घर में पली देशी गाय के दूध से ही छांछ और लस्सी तैयार करती हैं। स्वाद के साथ-साथ वे स्वच्छता का भी पूरा ध्यान रखती हैं। काम करते समय हमेशा सिर पर स्कार्फ बांधना उनकी इसी व्यावहारिक सोच का हिस्सा है, ताकि खाने में शुद्धता बनी रहे। अपनी जड़ों से जुड़कर आत्मनिर्भर बन सकते हैं: जहां गांव में आत्मनिर्भर होने के लिए स्व सहायता महिला समूह व्यवस्था है। वहीं उनका मानना है कि जब व्यक्ति खुद की बनाई चीजों का उपयोग करता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। यह बात सीमा मंडावी अपने जीवन में भी उतार रही हैं। पारंपरिक जीवनशैली को अपनाने के साथ वे शिक्षा को भी बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। वे अपनी दोनों बेटियों को उच्च शिक्षा दिला रही हैं। उनकी बड़ी बेटी हैदराबाद में एमएससी बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई कर रही है, जबकि छोटी बेटी भिलाई में रहकर नीट परीक्षा की तैयारी कर रही है। सीमा मंडावी का मानना है कि संस्कृति और शिक्षा साथ-साथ चलें, तभी समाज मजबूत बनता है।



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