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Home » एक-एक इंच जमीन पर खेती…:खेतों में मूंग-उड़द और मेढ़ों पर उगाया अरहर‎
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एक-एक इंच जमीन पर खेती…:खेतों में मूंग-उड़द और मेढ़ों पर उगाया अरहर‎

By adminMay 25, 2026No Comments3 Mins Read
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सरगुजा संभाग के दूरस्थ अंचलों में किसान अब आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों और नए प्रयोगों को तेजी से अपना रहे हैं। कोरिया जिले में रनई मंदिरपारा गांव के किसान हरिओम शरण साहू ने फसल चक्र के जरिए पारंपरिक खेती से हटकर नई मिसाल पेश की है। अमूमन जहां इलाके के अन्य किसान सालभर में केवल धान की पारंपरिक फसल पर ही निर्भर रहते हैं, वहीं हरिओम सालभर अपने खेतों का सही सदुपयोग कर बदल-बदलकर फसलें लेते हैं। इससे न केवल उनकी सालाना आमदनी बढ़ी है, बल्कि उनके खेतों की मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बरकरार है। हरिओम के पास 8 एकड़ कृषि भूमि है। इसमें वे साल के तीनों सीजन में समझदारी से फसल चक्र का प्रबंधन करते हैं। वे बताते हैं कि बारिश के मौसम में वे अपने सभी खेतों में धान की फसल लेते हैं। इसमें ज्यादातर मोटा धान होता है। घरेलू उपयोग के लिए कुछ हिस्से में पतला धान भी लगाते हैं। इसके बाद नवंबर में धान की कटाई पूरी होते ही वे खेतों में गेहूं और सरसों की बुवाई कर देते हैं। जैसे ही सरसों की फसल कटती है, वे उस खाली खेत में उड़द और मूंग की फसल ले लेते हैं। जब उड़द और मूंग की बोआई का समय आता है, ठीक उसी के आसपास गेहूं की फसल भी पककर तैयार हो जाती है। फिलहाल हरिओम 2 एकड़ खेत में ग्रीष्मकालीन उड़द और मूंग की खेती कर रहे हैं। वहीं, जमीन के कोने-कोने का सटीक सदुपयोग करते हुए उन्होंने खेतों की मेढ़ों पर अरहर की फसल उगा रखी है। हरिओम का कहना है कि वे एक फसल लेने के बाद खेत को कुछ समय के लिए खाली भी छोड़ देते हैं। हमेशा खेत बदल-बदलकर फसल लेते हैं। दलहनी फसलों की जड़ों से नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है, जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है और मिट्टी स्वाभाविक रूप से उपजाऊ बनी रहती है। हरिओम अपनी सफल खेती का पूरा श्रेय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के मैदानी अधिकारियों को देते हैं। वे लगातार इन विशेषज्ञों के संपर्क में रहते हैं। फसल चक्रण की नई तकनीकों, फसलों में लगने वाली बीमारियों, उनके जैविक उपचार, उपज बढ़ाने के तरीकों, सही समय पर सही बीज के चुनाव और मिट्टी की जांच जैसी बारीकियों को सीखते हैं। इसके साथ ही वे शासन की किसान कल्याण योजनाओं व अन्य शासकीय सुविधाओं का भी पूरा लाभ उठाते हैं। विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से खेती के प्रति उनकी समझ इतनी विकसित हो चुकी है कि वे सालभर दलहन-तिलहन फसलों का दोहरा लाभ ले रहे हैं और क्षेत्र के अन्य पारंपरिक किसानों के लिए एक रोल मॉडल बन चुके हैं।



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