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छत्तीसगढ़ के शासकीय कॉलेजों में होने वाली असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती के नियमों में 11 साल बाद एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। उच्च शिक्षा विभाग आगामी भर्ती में स्नातक में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक की अनिवार्यता को हटाने की तैयारी कर रहा है। यह कवायद छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) की उस आपत्ति के बाद शुरू हुई है, जिसमें कहा गया है कि यह शर्त वर्तमान यूजीसी रेगुलेशन-2018 के अनुरूप नहीं है। गौरतलब है कि इससे पहले वर्ष 2014 और 2019 की भर्तियों में यह शर्त लागू थी, जिसके कारण नेट और पीएचडी उत्तीर्ण होने के बावजूद कई योग्य अभ्यर्थी आवेदन करने से वंचित रह गए थे। आयोग का तर्क है कि जब नेट और सेट जैसी पात्रता परीक्षाओं के लिए भी स्नातक में 50% की ऐसी कोई बाध्यता नहीं है, तो भर्ती में इसे लागू रखने से कई योग्य उम्मीदवार प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। विभाग के इस नए कदम से लंबे समय से तैयारी कर रहे सैकड़ों अभ्यर्थियों के लिए कॉलेजों में नौकरी का रास्ता आसान हो जाएगा। विभाग 625 असिस्टेंट प्रोफेसर तथा ग्रंथपाल और क्रीड़ाधिकारी के 75 पदों पर भर्ती की तैयारी कर रहा है। इसके लिए सीजीपीएससी को मांग-पत्र भेजा था। लेकिन आयोग ने भर्ती प्रस्ताव में नौ बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज करते हुए संशोधन के लिए फाइल वापस कर दी। विभाग ने अब इन आपत्तियों के निराकरण के लिए एक समिति बनाई है, जो जल्द संशोधित प्रस्ताव आयोग को भेजेगी। इसके बाद भर्ती का विज्ञापन जारी होने की संभावना है। सीजीपीएससी की सबसे महत्वपूर्ण आपत्ति भर्ती नियमों में शामिल ‘अच्छे शैक्षणिक रिकॉर्ड’ की शर्त को लेकर है। प्रस्ताव में स्नातक स्तर पर न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक अनिवार्य रखे गए हैं, जबकि यूजीसी रेगुलेशन-2018 में ऐसी बाध्यता नहीं है। 2014 और 2019 की भर्ती में शर्त लागू प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफेसर की पिछली भर्तियां 2009, 2014 और 2019 में हुई थीं। वर्ष 2014 और 2019 की भर्ती में भी स्नातक में 50 प्रतिशत अंक की शर्त लागू थी, जिसके कारण कई नेट और पीएचडी उत्तीर्ण अभ्यर्थी आवेदन नहीं कर सके थे। जानकारी के मुताबिक, आयोग की आपत्ति के बाद विभाग इस प्रावधान को हटाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। सीजीपीएससी की आपत्ति सीजीपीएससी ने उच्च शिक्षा के प्रस्ताव को लेकर जो आपत्ति जताई थी उसके अनुसार आरक्षण रोस्टर का गलत संधारण, दिव्यांगता श्रेणी के विवरण का न होना, दिव्यांगजन प्रमाण-पत्र का संलग्न न होना, सह-विषयों की स्पष्टता की कमी, बिना हस्ताक्षर का प्रस्ताव, आयु सीमा में छूट के नियमों पर भ्रम, स्नातक में 50% अंक की शर्त आदि।
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