नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी को लेकर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित पदों पर तय सीमा से अधिक दिव्यांग उम्मीदवारों को केवल उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्ति देना कानूनन गलत है।
याचिका की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने मेरिट लिस्ट की समीक्षा कर 90 दिनों के भीतर दोबारा मेरिट लिस्ट बनाने का निर्देश राज्य सरकार को दिया है।
उमेश कुमार श्रीवास, नेहा साहू, प्रमोद कुमार साहू और अन्य ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की है।
याचिका में बताया है कि लोक शिक्षण संचालनालय ने नौ मार्च 2019 को व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षक के विभिन्न खाली पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था।
इस भर्ती में ओबीसी वर्ग के याचिकाकर्ताओं ने भी हिस्सा लिया और मेरिट सूची में स्थान बनाया। लेकिन जब चयन समिति ने प्रोविजनल मेरिट लिस्ट जारी की, तो ओबीसी कैटेगरी के पदों पर सात प्रतिशत की तय सीमा से कहीं ज्यादा दिव्यांग उम्मीदवारों को चुन लिया गया।
इन तीन विषयों के शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी
याचिकाकर्ताओ ने बताया कि व्याख्याता बायोलाजी ई-संवर्ग के लिए कुल 200 पद भरे जाने थे, जिसमें ओबीसी के हिस्से के पदों में से 14 पद दिव्यांगों के लिए आरक्षित होने चाहिए थे, लेकिन चयन समिति ने ओबीसी कोटे के तहत ही छह दिव्यांगों को उनकी मेरिट के आधार पर सीधे नियुक्त कर दिया, जिससे सामान्य ओबीसी उम्मीदवारों का हक प्रभावित हुआ। यही तरीका शिक्षक गणित और सहायक शिक्षक विज्ञान भर्ती में भी अपनाया गया।
राज्य सरकार के जवाब का याचिकाकर्ताओ ने किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता कार्यलय के लाॅ अफसर ने कहा कि जिन दिव्यांग उम्मीदवारों का चयन किया गया, उन्होंने मेरिट सूची में स्थान प्राप्त किया था। सर्कुलर के अनुसार उनकी योग्यता को देखते हुए बिना उनकी मूल श्रेणी की परवाह किए उन्हें नियुक्ति दी गई। वहीं, याचिकाकर्ताओं की तरफ से कहा गया, चयन समिति की यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ है।
हाई कोर्ट ने कहा-चयन समिति द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पूरी तरह त्रुटिपूर्ण
याचिका की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने कहा, चयन समिति द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण है। इस तरह की प्रक्रिया से सभी श्रेणियों के उम्मीदवारों को समान अवसर नहीं मिल पाता है। अधिकारियों को दिव्यांगों को समान अवसर देने के लिए आरक्षण नियमों का सही पालन करना चाहिए था।
कोर्ट ने समझाया आरक्षण और चयन प्रक्रिया
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी और राजेश कुमार डरिया मामलों का हवाला देते हुए सामाजिक और विशेष आरक्षण के अंतर को समझाते हुए कहा है, वर्टिकल आरक्षण यानी एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवार यदि अपनी योग्यता से जनरल सीट लाते हैं, तो उन्हें कोटे में नहीं गिना जाता। वहीं होरिजोंटल आरक्षण यानी दिव्यांग, महिलाओं में से कोई दिव्यांग उम्मीदवार मेरिट से चुनकर आता है, तो उसे उसकी संबंधित सामाजिक श्रेणी के कोटे में रखा जाएगा।
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