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धान का कटोरा कहलाने वाले छत्तीसगढ़ में बीज अनुसंधान और खेती की जमीन के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। प्रदेश में धान की 23 हजार से अधिक पारंपरिक किस्मों का संरक्षण किया गया है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने स्थापना के बाद 45 से ज्यादा उन्नत धान वैराइटी विकसित की हैं। इसके बावजूद राज्य के करीब 70% खेतों में दूसरे राज्यों, खासकर आंध्र प्रदेश से विकसित बीजों की खेती हो रही है। किसानों की पहली पसंद आज भी स्वर्णा और एमटीयू-1010 जैसी बाहरी किस्में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या रिसर्च की कमी नहीं, बल्कि लैब टू लैंड सिस्टम की विफलता है। करोड़ों रुपए के अनुसंधान के बाद भी स्थानीय वैराइटी किसानों का भरोसा नहीं जीत सकीं, जबकि निजी कंपनियां और बाहरी बीज गांव-गांव तक पहुंच गए। आंध्र की दो किस्मों ने बाजार पर कब्जा किया छत्तीसगढ़ बीज निगम के आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन में किसानों को वितरित होने वाले कुल धान बीज में करीब 70% हिस्सा सिर्फ दो वैराइटी- स्वर्णा और एमटीयू-1010 का रहता है। दोनों किस्में वर्षों पहले आंध्र प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय से विकसित हुई थीं। कम पानी, सूखा और कीट प्रकोप की स्थिति में भी इनकी फसल अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है। औसतन 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिलने से किसान इन पर ज्यादा भरोसा करते हैं। किसान भरोसा वहीं करता है, जहां उत्पादन ज्यादा
किसान संघ के प्रदेश महामंत्री नवीन शेष कहते हैं कि किसानों के बीच अभी भी स्वर्णा जैसी बाहरी वैराइटी पर भरोसा बना हुआ है। किसान वही बीज चुनता है, जिसका उत्पादन खेत में देखा हो। कृषि विश्वविद्यालय की नई किस्में केवल विकसित कर देने से काम नहीं चलेगा। यह भी दिखाना होगा कि इन किस्मों की उत्पादन क्षमता कैसी होती है? विश्वविद्यालय ने वैराइटी बनाई, लेकिन खेत तक नहीं पहुंची
प्रदेश में अलग-अलग फसलों पर अनुसंधान के लिए दो कृषि विश्वविद्यालय, उद्यानिकी विश्वविद्यालय और कई कृषि विज्ञान केंद्र काम कर रहे हैं। इन संस्थानों का उद्देश्य स्थानीय जलवायु और मिट्टी के मुताबिक ऐसी किस्में विकसित करना था, जो कम पानी, सूखा और बीमारी की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन दें। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने महामाया, राजेश्वरी, बम्लेश्वरी, विक्रम टीसीआर, इंदिरा एरोबिक, देवभोग, दुबराज सिलेक्शन और विष्णुभोग सिलेक्शन जैसी कई किस्में विकसित कीं। फिर भी इनका प्रसार सीमित रहा। महामाया पुरानी वैराइटी है, इसकी थोड़ी मांग है। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में शोध हुए लेकिन नई किस्मों को किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी रणनीति नहीं बनी।
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