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Home » छत्तीसगढ़ की माटी में अब महकेगा यूपी का ‘दशहरी’ और आंध्र प्रदेश का ‘बैंगनफल्ली’, किसानों की बदलेगी किस्मत
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छत्तीसगढ़ की माटी में अब महकेगा यूपी का ‘दशहरी’ और आंध्र प्रदेश का ‘बैंगनफल्ली’, किसानों की बदलेगी किस्मत

By adminMay 22, 2026No Comments3 Mins Read
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21 05 2026 dasheri and banganapalli mango
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नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध दशहरी और आंध्र प्रदेश के नंदियाल क्षेत्र में उगाया जाने वाला बैंगनफल्ली आम अब छत्तीसगढ़ की जलवायु में भी शानदार उत्पादन दे सकता है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में हुए एक महत्वपूर्ण शोध में यह सामने आया है कि प्रदेश की जलवायु कई उन्नत और लोकप्रिय आम किस्मों के लिए बेहद अनुकूल साबित हो रही है।

शोधकर्ता डा. गुंजा ठाकुर ने 15 प्रमुख किस्मों का अध्ययन कर पाया कि दशहरी, बैंगनफल्ली, मल्लिका, तोतापरी और छत्तीसगढ़ नंदी राज जैसी किस्में रायपुर, बस्तर और मैदानी क्षेत्रों में बेहतर फलन दे रही हैं। खास बात यह है कि मौसम परिवर्तन और तापमान में उतार-चढ़ाव के बावजूद इन किस्मों की उत्पादन क्षमता प्रभावित नहीं हो रही।

शोध से यह उम्मीद बढ़ी है कि आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ भी आम उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में उभर सकता है और किसानों को बेहतर आय का नया विकल्प मिल सकता है।

15 किस्मों के अध्ययन में मिले चौंकाने वाले परिणाम

शोध में अल्फांजो, बैंगनफल्ली, बनारसी लंगड़ा, चौसा, दशहरी, कृष्ण भोग, तालपड़, मल्लिका, तोतापरी, नीलम और बारामासी सहित 15 किस्मों का परीक्षण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि दशहरी, मल्लिका, बैंगनफल्ली और तोतापरी जैसी किस्में प्रदेश की जलवायु में लगातार बेहतर उत्पादन दे रही हैं। वहीं लंगड़ा और चौसा में हर वर्ष नियमित फलन नहीं हो पा रहा। इससे किसानों को अब नई किस्मों के चयन में वैज्ञानिक आधार मिल सकेगा।

नीलम और बारामासी में वर्ष में दो बार फलशोध के दौरान नीलम और बारामासी किस्मों की खास विशेषता भी सामने आई। इन दोनों किस्मों में साल में दो बार फल लगने की क्षमता पाई गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन किस्मों को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जाए तो किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही बाजार में लंबे समय तक आम की उपलब्धता बनी रह सकती है। यह शोध जलवायु परिवर्तन के दौर में खेती के नए विकल्प भी खोल रहा है।

मेडिकल छोड़ चुना कृषि अनुसंधान का रास्ता

डा. गुंजा ने बताया कि पहले मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की थी और एक वर्ष ड्राप भी लिया था। डेंटल सीट मिलने के बाद भी परिवार की सलाह पर एग्रीकल्चर क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला किया। मां पदमा ठाकुर शिक्षा विभाग में क्लर्क हैं, जबकि पिता प्रदीप ठाकुर व्यवसाय से जुड़े हैं। डा. गुंजा का कहना है कि कृषि अनुसंधान के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने और नई तकनीक विकसित करने का अवसर उन्हें इस क्षेत्र की ओर खींच लाया।

यह भी पढ़ें- केमिकल रिपनर से पकाए जा रहे थे आम-तरबूज, खाद्य सुरक्षा विभाग ने मारा छापा, कई दुकानों पर कार्रवाई

जगदलपुर में किसानों को मिल रहा शोध का फायदा

वर्तमान में डा. गुंजा शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय एवं जोनल परिक्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र जगदलपुर में गेस्ट साइंटिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन को देखते हुए ऐसी किस्मों को बढ़ावा देना जरूरी है, जो कम जोखिम में अधिक उत्पादन दें।

उनका मानना है कि यदि किसानों को सही पौधे, वैज्ञानिक जानकारी और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो छत्तीसगढ़ में आम उत्पादन बड़ा कृषि व्यवसाय बन सकता है। शोध में डा. प्रभाकर सिंह, डा. जीएल शर्मा और डा. हेमंत कुमार पाणिग्रही का मार्गदर्शन मिला।



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