महाराष्ट्र के सतारा जिले से आने वाले रामचंद्र और पुणे की सुनीता वर्ष 1990 में विवाह के सात दिन बाद ही बस्तर के बारसूर पहुंच गए थे। उस समय अबूझमाड़ और …और पढ़ें

HighLights
- बस्तर में तीन दशक से वनवासियों की सेवा में जुटे दंपती को मिली राष्ट्रीय पहचान।
- वर्ष 1990 में शादी के सात दिन बाद ही महाराष्ट्र से बस्तर के बारसूर पहुंचे थे दंपती।
- तब अबूझमाड़ स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, बुनियादी संसाधनों से लगभग वंचित था।
नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। अबूझमाड़ के घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और माओवादी हिंसा से प्रभावित इलाकों में तीन दशक तक नि:स्वार्थ सेवा करने वाले रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले को सोमवार को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया गया।
राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में मिला यह सम्मान केवल एक दंपती की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन वनवासी अंचलों की पीड़ा और संघर्ष की भी राष्ट्रीय पहचान है, जहां वर्षों तक गोडबोले दंपती ने जीवन समर्पित कर सेवा की।
महाराष्ट्र के सतारा जिले से आने वाले रामचंद्र और पुणे की सुनीता वर्ष 1990 में विवाह के सात दिन बाद ही बस्तर के बारसूर पहुंच गए थे। उस समय अबूझमाड़ और आसपास के इलाके स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और बुनियादी संसाधनों से लगभग वंचित थे।
माओवादी प्रभाव और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां पहुंचना भी आसान नहीं था, लेकिन गोडबोले दंपती ने इन्हीं कठिन परिस्थितियों में सेवा का रास्ता चुना।
बारसूर पहुंचते ही गोडबोले ने वनवासी कल्याण आश्रम के बंद पड़े क्लीनिक को दोबारा शुरू किया। वहीं सुनीता ने गांव-गांव जाकर अभिभावकों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। स्थानीय समाज से जुड़ने के लिए दोनों ने गोंडी भाषा सीखी। इसी आत्मीयता और विश्वास ने उन्हें वनवासी समाज के बेहद करीब ला दिया।

भाई और दीदी के नाम से जानते हैं लोग
- धीरे-धीरे गोडबोले दंपती का जीवन अबूझमाड़ और बस्तर की पगडंडियों में ही रच-बस गया।
- सुबह क्लीनिक में मरीजों का उपचार और दोपहर बाद दूरस्थ गांवों तक पैदल पहुंचकर स्वास्थ्य सेवा देना उनकी दिनचर्या बन गई।
- आदिवासी समाज उन्हें भाई और दीदी के नाम से पुकारने लगा।
- गोडबोले दंपती ने केवल इलाज तक खुद को सीमित नहीं रखा।
- उन्होंने कुपोषण, एनीमिया, नशामुक्ति, स्वास्थ्य जागरूकता और शिक्षा के क्षेत्र में लगातार काम किया।
- ग्रामीण युवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण देकर गांव स्तर पर स्वास्थ्य सहायता तैयार करने का प्रयास भी किया।
एक लाख से अधिक लोगों का किया इलाज
रामचंद्र गोडबोले अब तक एक लाख से अधिक लोगों का इलाज कर चुके हैं। दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा और अबूझमाड़ के अनेक गांव आज भी उनके सेवा कार्यों के साक्षी हैं। गोडबोले बताते हैं कि जर्मनी के समाजसेवी चिकित्सक डा. अलबर्ट स्वाइटजर की किताब पढ़ने के बाद उनके भीतर वनवासी सेवा का संकल्प जागा था। वर्षों की तपस्या और नि:स्वार्थ सेवा को अब पद्मश्री के रूप में राष्ट्रीय सम्मान मिला है।
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