अंतरराष्ट्रीय मदर्स डे पर पढ़िए रायपुर शहर की ऐसी तीन मांओं का संघर्ष, जो खुद आग में तपकर अपने बच्चों को सोना बना रही है। …और पढ़ें

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। मदर्स डे केवल मां के प्रेम का उत्सव नहीं, बल्कि उन महिलाओं के संघर्ष और साहस को सलाम करने का दिन भी है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अकेले अपने बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उठाई। शहर में ऐसी कई महिलाएं हैं, जो “सिंगल मदर” बनकर न सिर्फ अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और संस्कार दे रही हैं, बल्कि समाज के सामने आत्मनिर्भरता की मिसाल भी पेश कर रही हैं। किसी ने पति को खोने के बाद जीवन की नई शुरुआत की, तो किसी ने पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी। आर्थिक चुनौतियों, सामाजिक दबाव और अकेलेपन के बावजूद इन मांओं ने अपने बच्चों के सपनों को टूटने नहीं दिया। वे मां के साथ पिता की भूमिका भी निभा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मदर्स डे पर पढ़िए शहर की ऐसी तीन मांओं का संघर्ष, जो खुद आग में तपकर अपने बच्चों को सोना बना रही है।
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बेहतर परवरिश के लिए खुद को तपाया
ये कहानी गीता वर्मा की है, जब बेटी कक्षा छटवीं में थी, तब पति द्वारा घरेलू हिंसा की शिकार होने के बाद पति से अलग हो गई। तब तक सिर्फ 12वीं पास थी और बेटी की अकेले अच्छी परवरिश चुनौती थी। तो खुद पढ़ने लगी। स्नातक, पोस्ट स्नातक, बीएड की पढ़ाई करके शिक्षिका की नौकरी करते हुए बेटी की परवरिश में जुट गई। जब लगा कि बेटी यक्षिता की अच्छी परवरिश की धन की जरूरत है तो 25 हजार रुपये से अपना बिजनेस शुरू किया। बेटी अब 18 साल की है और वो भी बिजनेस में साथ देती है। यक्षिता बाक्सिंग चैंपियन है, जो कई नेशनल टूर्नामेंट जीत चुकी है। गीता का कहना हैं कि अब अपनी बेटी के लिए बेहतर करने में जुटी हूं, उसे मां-पिता दोनों का प्यार देते हुए अपना फर्ज निभा रही हूं।
बांझ का ताना सुनी, होम सर्विस भी दी
फाफाडीह स्थित रामदेव पीर मंदिर की पुजारी अन्नपूर्णा शर्मा संभवत: शहर की पहली महिला पुजारी है, जो मंदिर में पूजा करती हैं। अन्नपूर्णा का कहना हैं कि मां बनने का एहसास शादी के 12 साल बाद पता चला। सन्1989 में शादी हुई और 12 साल बाद 2001 में बड़े बेटा और 2002 में छोटे बेटे का जन्म हुआ। तब तक समाज मुझे बांझ कहकर ताना देता था। कैंसर के कारण पति का देहांत हो गया। अपने बच्चों की परवरिश के लिए मैं ब्यूटीशियंस का काम करने लगी। होम विजिट करके होम सर्विस देती थी। मैंने दोनों बच्चों को पंडिताई सिखाने के लिए प्रयाग और हिमाचल भेजने का फैसला किया। उस दौरान मैंने खूब काम किया, ताकि बच्चों को पढ़ा सकूं। आज दोनों बच्चे अपने पैरों में खड़े है। खुशी होती है कि मेरी मेहनत रंग लाई।
हताश नहीं, लोगों को जीना सीखा रहीं
सत्य सरोज का कहना हैं कि सब कुछ ठीक चल रहा था और फिर जीवन में जब कोई अप्रिय घटना घटे तो समझे कि ईश्वर ने शायद किसी और प्रयोजन से धरती पर भेजा है। जब पति से अलग हुई तो अन्य माताओं की तरह मैं भी इसी डर में थी कैसे दोनों बेटों की अकेली परवरिश करुंगी। छोटे बच्चों को अकेले घर पर छोड़कर नौकरी पर जाती। लेकिन दोनों बच्चे अविराज और पवित्र ने अपनी मां समझा। आज की युवा पीढ़ी गलत दिशा में जा रही, लेकिन मेरे बच्चे नशा मुक्त के लिए युवाओं को प्रेरित कर रहे है। हम कभी हताश नहीं हुए। मैंने अपने जीवन से बहुत कुछ सीखा। आज दोनों बच्चे पढ़ते हुए नौकरी कर रहे है और मैं अपनी जैसी कई माओं को स्प्रिचुअल से जोड़कर उन्हें संघर्षपूर्ण जीवन को सरल तरीके से जीने के गुर सीखा रही हूं।
मदर्स डे क्यों मनाते हैं?
हर साल मई के दूसरे रविवार को दुनिया भर की माताओं के निस्वार्थ प्रेम, बलिदान और समाज में उनके अद्वितीय योगदान को सम्मानित और सराहना करने के लिए मनाया जाता है। यह दिन मां के प्रति सम्मान जताने और उनके प्रति प्यार और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक विशेष अवसर है। मदर्स डे का आधुनिक रूप सन् 1908 में एना जार्विस द्वारा अपनी मां को श्रद्धांजलि देने और बच्चों के लिए माताओं के बलिदान को सम्मानित करने के लिए शुरू किया गया था।
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