सुकमा जिले का रामाराम… मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान भूदेवी की आराधना की थी। भूदेवी को लक्ष्मी का स्वरूप भी माना जाता है और आदिवासी स्थानीय बोली में चिटमिटिन अम्मा कहते हैं। उन्हें लक्ष्मी के स्वरूप में
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क्षेत्र के आदिवासी समुदाय में चिटमिटिन देवी की पूजा से ही सारे शुभ कार्य शुरू होते हैं। दशकों से यहां रामाराम में चिटमिटिन देवी की पूजा आदिवासी करते आ रहे हैं। उनका मानना है कि उनकी रक्षा करने के साथ ही उन्हें सुख-समृद्धि भी चिटमिटिन देवी की कृपा से मिलती है।
दरअसल, भगवान श्रीराम का वनगमन केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति और आस्था की गहराई में बसा इतिहास है। शोध बताते हैं कि भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्षों के वनवास काल में से लंबा समय छत्तीसगढ़ में बिताया।
उत्तर भारत से दक्षिण भारत की ओर बढ़ते हुए श्रीराम छत्तीसगढ़ के करीब 75 से ज्यादा स्थानों से होकर गुजरे, जिनमें से 51 जगहों पर ठहरकर उन्होंने अपनी उपस्थिति भी दर्ज की। इन्हीं में से एक सुकमा जिले का रामाराम गांव है, जो आज भी श्रीराम के भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
सुकमा जिला मुख्यालय से करीब 8 किमी दूर स्थित रामाराम गांव में आज भी सदियों पुराना मंदिर है। मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने यहां भूदेवी की आराधना की थी। यही वजह है कि यहां भूदेवी को चिटमिटिन अम्मा देवी के नाम से पूजा जाता है।
स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि उनकी देवी के प्रति आस्था इतनी गहरी है कि क्षेत्र में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत चिटमिटिन देवी के रूप में मिट्टी की पूजा से की जाती है। रामाराम के चिटमिटिन अम्मा देवी ट्रस्ट के अध्यक्ष मनोज देव बताते हैं कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने इस स्थान को अपनी साधना के लिए चुना था। आज भी यहां के लोग मानते हैं कि मिट्टी ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।
सुकमा: रामाराम की चिटमिटिन अम्मा आदिवासियों के लिए लक्ष्मी का स्वरूप, मान्यता ऐसी- वनवास के समय श्रीराम ने की थी भूदेवी के स्वरूप में इनकी पूजा
हर साल फरवरी में लगता है रामाराम मेला, सुकमा जमींदार परिवार 700 सालों से कर रहा आराधना
पहले हफ्ते में दो दिन खुलता था, अब रोज खुलता है देवी का मंदिर
पहले मंदिर ट्रस्ट हफ्ते में दो दिन, मंगलवार व शनिवार को खुलता था, लेकिन अब रोज ही मंदिर के पट खुलते हैं। यहां के पुजारी दुर्गाप्रसाद ने बताया कि मंदिर में स्थानीय लोगों की बड़ी आस्था है। माटी तिहार से लेकर आदिवासियों का कोई भी पर्व हो, ग्रामीण यहां पहुंचते हैं। दीपावली में भी ग्रामीण यहां दीप जलाने के साथ ही चिटमिटिन देवी की पूजा करते हैं।
श्रीराम शोध संस्थान ने किया स्थल को चिन्हित नई दिल्ली के श्रीराम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास ने कुछ साल पहले ही रामाराम को श्रीराम वनगमन स्थल के रूप में चिन्हित कर दिया था। फरवरी के महीने में हर साल यहां भव्य मेला लगता है। इतिहासकारों की मानें तो यह परंपरा करीब 700 सालों से चली आ रही है। रियासतकाल में भी सुकमा जमींदार परिवार यहां देवी-देवताओं की पूजा करता रहा है, जो आज भी जारी है।
रामाराम और इंजरम में श्रीराम के आने के प्रमाण सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक का इंजरम गांव भी भगवान श्रीराम के वनवास पथ का एक अहम पड़ाव माना जाता है। यहीं भगवान श्रीराम ने शबरी नदी में स्नान के बाद भगवान शिव की आराधना कर शिवलिंग स्थापित किया था। श्रीराम के आने के बाद इस गांव का नाम इंजरम पड़ा। दरअसल गोंडी बोली में ‘एंजे राम’ का अर्थ ‘अभी राम आए थे’ है। ऐसे में गांव का नाम एंजेराम से चलता हुआ अपभ्रंश होकर इंजरम हो गया।
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