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छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की जमानत याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। ये मामला 2000 करोड़ रुपए के कथित शराब घोटाले से जुड़ा है। चैतन्य ने जमानत के साथ ही PMLA (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग) एक्ट की धारा 50 औ
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दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने ED को दस दिनो के भीतर पूरे काउंटर एफिडेविट जमा करने को कहा है। इसके बाद आगे सुनवाई होगी।
सिब्बल बोले- बिना समन गिरफ्तारी करना गलत
इस मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने की। चैतन्य बघेल की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और N. हरिहरन ने पक्ष रखा।
सिब्बल ने “बिना नोटिस गिरफ्तारी” पर सवाल उठाते हुए कहा कि “गैर-सहयोग का आरोप लगाकर गिरफ्तारी कर ली गई, बिना नोटिस दिए बिना, न ही समन। PMLA की धारा 19 के तहत बिना नोटिस गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जांच एजेंसी इंवेस्टिगेशन के नाम पर जानबूझकर देरी कर रही हैं। ताकि आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखा जा सके।
कोर्ट ने कहा – आरोप पर जवाब देना होगा
इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा —
“गैर-सहयोग एकमात्र आधार नहीं है। आरोपों का जवाब तो देना पड़ेगा।”
वहीं जस्टिस बागची ने कहा —
“यह सिर्फ गिरफ्तारी के आधार का मामला नहीं है, बल्कि सवाल यह भी है कि जांच कब तक चलेगी।”
ED का जवाब- हमारे पास जांच के लिए तीन महीने का वक्त
ED की ओर से ASG एस.वी. राजू ने कहा —
“सुप्रीम कोर्ट ने हमें जांच पूरी करने के लिए 3 महीने का समय दिया है। प्रक्रिया जारी है।”
ED के पास 10 दिन का समय
जिसके बाद कोर्ट ने मामले पर नोटिस जारी करते हुए ED को 10 दिन में काउंटर-एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। काउंटर फाइल होने के बाद अगली सुनवाई तय होगी।
अब समझिए PMLA को चुनौती क्यों दी गई
PMLA यानी प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कई शक्तियां ED को दी गई हैं। चैतन्य बघेल ने जो याचिका दायर की है, उसका मकसद है PMLA की धाराओं 50 और 63 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देना है।
धारा 50 (PMLA)
- ED को पूछताछ, गवाही लेने और दस्तावेज़ मांगने की शक्ति देती है।
- इस धारा के तहत ED अधिकारी न्यायिक शक्ति की तरह समन कर सकते हैं, बयान रिकॉर्ड कर सकते हैं।
- बयान को सबूत माना जाता है और चुप रहने का अधिकार सीमित माना जाता है।
धारा 63 (PMLA)
- जांच में “गैर-सहयोग” या गलत जानकारी देने पर दंड निर्धारित करती है।
- यानी अगर ED को लगे कि व्यक्ति सहयोग नहीं कर रहा, तो उसे सजा भी हो सकती है।
चैतन्य बघेल की याचिका में कहा गया है कि ये धाराएं संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं—
| Article 14 | समानता का अधिकार — ED को असाधारण अधिकार मिल जाते हैं |
| Article 20(3) | “सेल्फ-इनक्रिमिनेशन” का अधिकार — यानी खुद के खिलाफ बयान न देने का अधिकार |
| Article 21 | जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार — गिरफ्तारी/पूछताछ की प्रक्रिया न्यायसंगत नहीं |
याचिका में मुख्य तर्क
- ED बिना पर्याप्त आधार बताए गिरफ्तारी कर सकती है
- व्यक्ति को नोटिस या उचित अवसर दिए बिना “गैर-सहयोग” का आरोप लगाया जा सकता है
- बयान जबरन कराया जा सकता है, जिससे खुद को दोषी ठहराने की मजबूरी बनती है
- गिरफ्तारी और जांच को अनिश्चित समय तक बढ़ाने का अधिकार दुरुपयोग की संभावना पैदा करता है
सरल भाषा में कहें तो…
ये याचिका कहती है कि —
“ED को इतने ज्यादा अधिकार नहीं होने चाहिए कि वह किसी को बिना नोटिस और बिना संरक्षण के पूछताछ और सजा दे सके। ये अधिकार संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों से टकराते हैं।”
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