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Home » Ravana Dahan does not take place in Dengrapar of Balod | बालोद के डेंगरापार में नहीं होता रावण दहन: देव-दशहरा पर मंदिर में चढ़ाए गए 490 मिट्टी के घोड़े, 300 साल से चली आ रही परंपरा – Balod News
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Ravana Dahan does not take place in Dengrapar of Balod | बालोद के डेंगरापार में नहीं होता रावण दहन: देव-दशहरा पर मंदिर में चढ़ाए गए 490 मिट्टी के घोड़े, 300 साल से चली आ रही परंपरा – Balod News

By adminOctober 8, 2025No Comments2 Mins Read
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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डेंगरापार में आज भी सदियों पुरानी एक अनूठी परंपरा जीवित है। यहां दशहरा के अवसर पर रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि 15 गांवों के ग्रामीण देव दशहरा पर्व मनाते हैं। हरदेलाल बाबा के मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर मिट्ट

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इसी परंपरा के तहत मंगलवार (7 अक्टूबर) को डेंगरापार में इस साल का देव दशहरा पर्व धूमधाम से मनाया गया। बालोद जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर अर्जुन्दा के पास स्थित इस ग्राम में डेंगरापार (अ), नवागांव, घीना, कसहीकला, गड़ईनडीह और लासाटोला समेत 15 गांवों के ग्रामीण सेवा गाते हुए डांग-डोरी लेकर रैली के रूप में हरदे लाल मंदिर पहुंचे।

मंदिर परिसर में देर शाम तक भक्तों की लंबी कतार लगी रही। मिट्टी के घोड़े को टोकरी सहित सिर पर रखकर श्रद्धालु भक्ति गीतों के साथ मंदिर पहुंचे और हरदे लाल बाबा को अर्पित किया। इस वर्ष कुल 490 मिट्टी के घोड़े चढ़ाए गए। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस परंपरा के माध्यम से हरदे लाल उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

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मान्यता- मंदिर में मांगी गई मनोकामना होती है पूरी

मंदिर समिति के अध्यक्ष अवतार सिंह कंवर, उपाध्यक्ष अमर नाथ साहू, कोषाध्यक्ष शिवराज देवदास, सचिव समयलाल, सहसचिव किशन अंधिया, बैगा भोज कुमार ने बताया कि हरदेवलाल बाबा मंदिर में अनोखा दशहरा मनाने की परंपरा लगभग 300 साल से निभाते आ रहे हैं। मान्यता है कि यहां मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। जिसके बाद हरदेव लाल को उनकी सवारी यानी घोड़ा चढ़ाने भक्त आते हैं।

महिलाओं का प्रवेश वर्जित, प्रसाद ग्रहण करने पर भी मनाही

महिलाओं का मूल मंदिर में प्रवेश वर्जित है। महिलाओं का प्रसाद खाना भी वर्जित होता है। यदि कोई गर्भवती है तो उसके पति को भी प्रसाद खाने की मनाही होती है। डेंगरापार में अलग से दशहरा नहीं मनाया जाता, न ही रावण मारा जाता है। बताया गया कि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

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घोड़े की सवारी कर आए थे हरदेलाल

घीना के समाज सेवी डालचंद जैन का कहना है कि पूर्वजों से एक दंतकथा सुनते आए हैं कि हरदेलाल घोड़े में सवार होकर यहां आए थे और लोगों का दुख-दूर करते थे। उनके समय के लोगों ने उन्हें देवता स्वरूप मान लिया। करीब 90 साल पहले जब घीना बांध बना तब लोगों ने हरदेलाल का मंदिर बनवा दिया।



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