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Home » Play schools are free to do their own thing… no hassle of recognition, no fee limits, they can operate anywhere. | प्ले स्कूल मर्जी के मालिक…: न मान्यता का झंझट, न फीस सीमा, कहीं भी चल रहे – Raipur News
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Play schools are free to do their own thing… no hassle of recognition, no fee limits, they can operate anywhere. | प्ले स्कूल मर्जी के मालिक…: न मान्यता का झंझट, न फीस सीमा, कहीं भी चल रहे – Raipur News

By adminOctober 2, 2025No Comments3 Mins Read
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राजधानी रायपुर समेत प्रदेशभर में प्ले स्कूल चल रहे हैं। पर ये अपनी मर्जी के मालिक हैं। निजी स्कूलों की फीस पर लगाम लगाने के लिए कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ निजी विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम लागू किया गया। लेकिन यह नियम प्ले स्कूलों पर लागू नहीं है। इस व

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इसी तरह नियम नहीं होने की वजह से इन स्कूलों को शिक्षा विभाग से मान्यता भी नहीं लेनी पड़ती है। ये गली-मोहल्लों से लेकर भव्य इमारतों में चल रहे हैं और मनमानी फीस वसूल रहे हैं। इससे पैरेंट्स परेशान हैं। प्रदेश के प्री प्राइमरी स्कूलों की शिकायत शिक्षा विभाग के अफसरों तक पहुंची, लेकिन नियम न होने का हवाला देते हुए कोई कार्रवाई नहीं की गई।

इस मामले में भास्कर को पड़ताल में पता लगा कि प्रदेश में निजी विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम 2020 लागू है। स्कूल हर साल कितनी फीस बढ़ा सकते हैं, सब इस अधिनियम में है। वहीं प्री प्राइमरी यानी प्ले स्कूल नर्सरी, पीपी-1 और पीपी-2 के लिए 50 हजार से सवा लाख रुपए तक ले रहे है। यानी इनकी फीस इंजीनियरिंग, फार्मेसी, बीएड से भी अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे स्कूल जहां नर्सरी से पढ़ाई शुरू होती है और 10वीं या 12वीं तक की कक्षाएं संचालित हैं, वहां परेशानी नहीं है। परेशानी वहां है, जहां सिर्फ प्री-प्राइमरी है।

मध्यप्रदेश, गुजरात की तरह प्ले स्कूल के नियम बनाना जरूरी

छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता का कहना है कि प्ले स्कूल के लिए छत्तीसगढ़ में नियम बनाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अभी यह स्कूल किसी नियम से बंधे नहीं हैं। जो नर्सरी से दसवीं या बारहवीं चला रहे हैं वहां कोई परेशानी नहीं है। लेकिन जहां सिर्फ प्री प्राइमरी है वहां परेशानी है। देश के कुछ राज्यों जैसे मप्र, गुजरात आदि में प्ले स्कूल संचालन के लिए नियम हैं, लेकिन वह महिला बाल विकास के पास है। यहां भी नियम बनने चाहिए।

आरटीई के दायरे में भी नहीं, इसलिए परेशानी

शिक्षा का अधिकार आरटीई के दायरे में 6 से 14 साल तक के बच्चे आते हैं। यह कानून 2009 में आया और प्रदेश में 2010 से लागू है। इसके अनुसार निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित हैं। प्री-प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों की उम्र छह साल से कम रहती है, इसलिए यह नियम प्ले या प्री-प्राइमरी स्कूलों में लागू नहीं होता है।

सत्र 2024-25 तक यह फीस ली गई

  • बी.फार्मेसी : 70 हजार से 80 हजार प्रतिवर्ष।
  • डी.फार्मेसी : 60 हजार से 65 हजार प्रतिवर्ष।
  • बीएससी नर्सिंग : 55 हजार रुपए से 59 हजार प्रतिवर्ष।
  • बीएड: 60 से 65 हजार रुपए प्रतिवर्ष।
  • बीई : 70 से 80 हजार रुपए सालाना।

^जो स्कूल नर्सरी के साथ कक्षा पहली से लेकर आठवीं, दसवीं या बारहवीं तक संचालित है उसको मान्यता दे रहे हैं। जहां सिर्फ प्री-प्राइमरी है उन स्कूलों को हम मान्यता नहीं देते। –हिमांशु भारती, जिला शिक्षा अधिकारी रायपुर



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