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खमगड़ा जलाशय की जर्जर नहर से परेशान किसानों ने किया श्रमदान, 3 किलोमीटर नहर की की अस्थाई मरम्मत

जशपुर जिले की बड़ी सिंचाई परियोजना में शामिल खमगड़ा जलाशय योजना एक बार फिर इस पर आश्रित किसानों के लिए मुसीबत बन गई है। इस जलाशय की नहर की जर्जर हालत से परेशान किसानों ने बुधवार को श्रमदान किया, ताकि उनके खेतों तक पानी पहुंचाया जा सके और उनकी खड़ी फसल बच जाए।

खमगड़ा जलाशय की यह हालत जल संसाधन विभाग की घोर उपेक्षा और नाकामी का सबसे बड़ा स्मारक बन चुकी है। दो दशक पूर्व जिस परियोजना की नींव रखते समय शासन-प्रशासन ने किसानों को सिंचाई की सुविधा मिलने का दावा किया था, वह आज तक विभागीय फाइलों में टेस्टिंग के दौर से ही गुजर रही है।

पतराटोली से कोतबा मुख्य नहर तक जगह-जगह टूट-फूट और दरारों के कारण पानी आगे नहीं बढ़ पा रहा था। ऐसे में प्रशासन का इंतजार किए बिना तरुण शर्मा, परदेशी साहू, घनश्याम साहू, हेमसागर साहू, विक्की पटनायक, अगस्ति चौहान, आत्मा राम, दोरनो पैंकरा, दीपक साहू, मुन्ना साहू, चमरू राम सिदार, अजित राम, करम साय तिर्की, निराकार सिदार, बबलू सिदार, मुनकु सिदार और पुनि राम सिदार सहित लगभग 40 किसानों ने मोर्चा संभाल लिया।

इन किसानों ने सुबह 6 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक कड़ी धूप में लगातार मेहनत कर 3 किलोमीटर लंबी नहर में अस्थाई रिपेयरिंग के लिए पसीना बहाया, ताकि किसी तरह उनके खेतों तक जीवनरक्षक पानी पहुंच सके। इन किसानों ने पतराटोली पिकअप वेयर से जंगल के बीच दो जगह से पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहर को सैकड़ों प्लास्टिक के कट्टों में मिट्टी भरकर गार्डवाल की अस्थाई दीवार बनाकर मरम्मत की है।

किसानों ने बताया कि पहले भी इस जगह पर 10 से अधिक बार मरम्मत कर चुके हैं, लेकिन इंजीनियरिंग और पक्कीकरण के दौरान पहाड़ों से आने वाले पानी की निकासी का कोई समुचित उपाय विभाग द्वारा नहीं किया गया था, जिसके कारण यहां से नहर बार-बार टूट जाती है। जिसे हर साल 2 से 3 बार रिपेयरिंग कर कोतबा तक पानी ले जाया जाता है, जिसमें विभाग कोई स्थाई समाधान आज तक नहीं कर रहा है।

नहर सुधारने में जुटे स्थानीय किसान हेमसागर साहू ने बताया कि उनके खुद के 5 एकड़ खेत पूरी तरह सूखे पड़े हैं। उन्होंने कहा कि नहर मरम्मत के लिए अधिकारियों से न जाने कितनी बार शिकायत की है, लेकिन कोई देखने तक नहीं आता। राजकुमार नाम का कर्मचारी जो देख-रेख के लिए है, वह भी कभी नहीं आता। गर्मी और बारिश के अभाव में फसल बर्बाद हो रही है। हम सब मिलकर बोरियों और मिट्टी से नहर बांध रहे हैं, लेकिन पानी के दबाव से यह जुगाड़ दो-चार दिन में फिर फूट जाएगा।

श्रमदान करने पहुंचे किसान अगस्ति चौहान ने विभाग की पोल खोलते हुए बताया कि नहर की हालत इतनी जर्जर है कि यह पानी का दबाव झेल ही नहीं पाती। पहाड़ का पानी आते ही कमजोर मेड़ और सुराखों से नहर फूट जाती है। अगस्ति ने हताशा भरे स्वर में कहा कि ऐसा पहली बार नहीं है, अब तक हम किसान 10-12 बार खुद ही इस नहर को बांध चुके हैं। हर साल हमें 4 से 5 बार इसी तरह खुद फावड़ा चलाना पड़ता है।

नहर में उतरकर गड्ढे भर रहे किसान पुनि राम सिदार ने इस पूरी समस्या की तकनीकी खामी को उजागर किया। उन्होंने बताया कि यह मुख्य पक्की कैनाल है, लेकिन इसमें एकदम नीचे से पाइप गाड़ दिए गए हैं और जगह-जगह सुराख हो गए हैं। पानी आगे खेतों की तरफ जाने के बजाय इन्हीं सुराखों से बहकर बर्बाद हो जाता है।

पिकअप वियर के पास मरम्मत कर रहे किसान सुफल ने बताया कि जब उन्होंने शासन-प्रशासन से मदद की गुहार लगाई, तो अधिकारियों ने उनकी पीड़ा सुनने के बजाय सीधा कह दिया कि अभी मरम्मत के लिए फंड में पैसा ही नहीं है। इस जवाब ने किसानों की रही-सही उम्मीद भी तोड़ दी।

बहार निवासी किसान करम साय तिर्की ने बताया कि इस टूटी-फूटी नहर के कारण उनके गांव तक तो पानी कभी पहुंच ही नहीं पाता। उनके सारे खेत सूख चुके हैं, इसीलिए वे भी अन्य किसानों के साथ मिलकर इस मुख्य कैनाल को बांधने आए हैं।

किसानों के श्रमदान की जानकारी मिलते ही अधीनस्थ कर्मचारियों को नहर की मरम्मत करवाकर किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने का निर्देश दे दिया गया है। यह जानकारी नरेंद्र सिन्हा, एसडीओ, जल संसाधन, पत्थलगांव ने दी।

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