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Home » Kanker Tribal Villagers Turn to Jesus After Illness, No Official Conversion Recorded | कांकेर में 8 साल में कोई धर्मांतरण नहीं: फिर भी मसीही बन रहे आदिवासी, न दस्तावेजों में न सरकारी-रिकॉर्ड में धर्म बदला, बीमारी ही कहानी – Chhattisgarh News
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Kanker Tribal Villagers Turn to Jesus After Illness, No Official Conversion Recorded | कांकेर में 8 साल में कोई धर्मांतरण नहीं: फिर भी मसीही बन रहे आदिवासी, न दस्तावेजों में न सरकारी-रिकॉर्ड में धर्म बदला, बीमारी ही कहानी – Chhattisgarh News

By adminDecember 24, 2025No Comments7 Mins Read
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कांकेर में शव दफनाने को लेकर भड़की हिंसा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि क्या आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है। आरोप लगे, नारे लगे और आस्था को शक के कटघरे में खड़ा कर दिया गया। जब हम विवाद वाले गांव बड़े तेवड़ा और इससे सटे इलाको

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RTI से मिले दस्तावेज बताते हैं कि 2018 से जून 2025 तक कांकेर जिले में किसी ने भी धर्म परिवर्तन नहीं किया और ना ही इसके लिए कोई आवेदन दिया है। यहां गांवों में लोग चर्च के रजिस्टर नहीं दिखाते, कोई धर्म परिवर्तन का दस्तावेज नहीं है और सरकारी रिकॉर्ड में आज भी उनका वही धर्म दर्ज है जो जन्म से चला आ रहा है। फिर भी वे यीशु को मानते हैं।

जब उनसे इसकी वजह पूछी गई, तो लगभग हर घर से एक ही जवाब मिला बीमारी ठीक हो गई। किसी की सालों पुरानी तकलीफ, किसी बच्चे की बिगड़ती हालत और किसी परिवार की टूटी उम्मीद और फिर प्रार्थना के बाद राहत मिली। यहीं से शुरू होती है कांकेर की वह कहानी, जहां आरोप मतांतरण के हैं, लेकिन लोग कह रहे हैं, धर्म नहीं बदला, केवल भरोसा बदला है। भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए पूरी कहानी और ग्रामीणों की बातें:-

RTI से मिले दस्तावेजों के मुताबिक बीते 8 सालों में कोई धर्म परिवर्तन नहीं हुआ है।

RTI से मिले दस्तावेजों के मुताबिक बीते 8 सालों में कोई धर्म परिवर्तन नहीं हुआ है।

महेन्द्र बघेल, मसीही समाज

महेन्द्र बघेल, मसीही समाज

मूल धर्म में लौटने की दिक्कत के डर से दस्तावेजों में धर्म नहीं बदला।

हिंसा के बाद बड़े तेवड़ा गांव में सन्नाटा पसरा है। जिन घरों में कभी यीशु की प्रार्थनाएं गूंजती थीं, आज वहां ताले लटके हैं। गांव में मसीही समाज से जुड़े ज्यादातर परिवार या तो पलायन कर चुके हैं या डर के कारण आसपास के जंगलों और रिश्तेदारों के यहां शरण लिए हुए हैं। ऐसे हालात में गांव में केवल एक ही परिवार मिला, जिसने खुलकर बात की, महेन्द्र बघेल का परिवार।

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हालांकि, महेन्द्र की कहानी यहीं नहीं रुकती। वह बताते हैं कि शादी के बाद उन्होंने दोबारा हिंदू धर्म के अनुसार जीवन जीना शुरू किया और चर्च जाना बंद कर दिया। लेकिन कुछ समय बाद फिर से उनके जीवन में परेशानियां बढ़ने लगीं। बीते तीन सालों से वे दोबारा चर्च जाने लगे हैं।

महेन्द्र साफ कहते हैं कि उन्होंने कभी कागजी तौर पर अपना धर्म नहीं बदला। आज भी उनके सभी आधिकारिक दस्तावेज मार्कशीट, राशन कार्ड और जाति प्रमाण पत्र में धर्म के कॉलम में हिंदू ही दर्ज है। उनका कहना है कि यीशु को मानने के बाद कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि वे दस्तावेजों में भी धर्म परिवर्तन करा लें, लेकिन उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया। महेन्द्र कहते हैं।

“मैंने इसलिए रुकने का फैसला किया, क्योंकि अगर कभी अपने मूल धर्म में वापस लौटना चाहें तो बहुत दिक्कत हो जाएगी। बच्चों के प्रमाण पत्र बनवाने में भी परेशानी आएगी।

महेन्द्र बघेल ने एक साधारण कॉपी में लिखकर यह दावा किया है कि वे अपने मूल धर्म में वापसी कर रहे हैं। यह बयान किसी सरकारी प्रक्रिया के तहत नहीं दिया गया है।

महेन्द्र बघेल ने एक साधारण कॉपी में लिखकर यह दावा किया है कि वे अपने मूल धर्म में वापसी कर रहे हैं। यह बयान किसी सरकारी प्रक्रिया के तहत नहीं दिया गया है।

बीमारी ठीक हुई, आस्था बदली, कागज अब भी वही

कुरू टोला में मसीही समाज के लोगों के बीच मिलीं श्यामा दुग्गा बताती हैं कि वे पिछले कई सालों से यीशु को मानती हैं। अपनी बेटी की ओर इशारा करते हुए श्यामा कहती हैं कि उनकी बेटी और पति दोनों मिर्गी की बीमारी से पीड़ित थे। इलाज के लिए कई जगह भटकीं, काफी पैसा खर्च हुआ और यहां तक कि सोना-चांदी बेचकर भी इलाज कराया, लेकिन बीमारी में कोई सुधार नहीं हुआ।

श्यामा बताती हैं कि बाद में लोगों ने उन्हें परमेश्वर की शरण में जाने की सलाह दी। इसके बाद वे चर्च गईं और प्रार्थना के बाद बेटी और पति की तबीयत में सुधार हुआ। इसी अनुभव के बाद उनके परिवार ने यीशु पर विश्वास करना शुरू कर दिया।

दस्तावेजों में धर्म बदलने के सवाल पर श्यामा दो टूक कहती हैं। “हम खुद से क्यों बदलें? अगर किसी को बदलना है तो आकर हमारे कागजों में हमारा धर्म बदल दे।”

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तुरसिंह नरेटी, यीशु अनुयायी।

तुरसिंह नरेटी, यीशु अनुयायी।

कुरू टोला में ही रहने वाले तुरसिंह नरेटी भी कुछ ऐसा ही दावा करते हैं। तुरसिंह बताते हैं कि उन्होंने बीमारी ठीक होने से जुड़ी एक पत्रिका पढ़ी थी, जिसके बाद उनका रुझान चर्च की ओर हुआ। चर्च जाने के बाद उनकी बीमारी में सुधार हुआ और तब से वे यीशु को मानने लगे। हालांकि तुरसिंह भी साफ कहते हैं कि उन्होंने कभी दस्तावेजों में अपना धर्म नहीं बदला।

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आसपास के गांवों में भी यही कहानी

भर्री टोल में रहने वाली रजाय वट्टी बताती हैं कि उनके पिता लंबे समय से कमर दर्द से परेशान थे, जबकि कोयलीबेड़ा में रहने वाली उनकी बड़ी बहन भी लगातार बीमार रहती थी। दोनों चर्च गए और प्रार्थना के बाद उनकी तबीयत में सुधार हुआ। इसके बाद पिता और बहन ने यीशु पर विश्वास करना शुरू कर दिया।

रजाय के मुताबिक, इसी अनुभव के बाद उनके माता-पिता और पूरे परिवार ने चर्च जाना शुरू किया। हालांकि समय के साथ सास-ससुर इससे पीछे हट गए, लेकिन रजाय और उनके पति आज भी चर्च जाते हैं और खुद को यीशु का विश्वासी मानते हैं। हालांकि रजाय वट्टी के परिवार ने भी दस्तावेजों में अपना धर्म नहीं बदला है।

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ब्रेनवॉश कर मतांतरण का आरोप

सर्वसमाज बस्तर और जनजातीय सुरक्षा मंच के प्रतिनिधि देवेंद्र टेकाम का कहना है कि संविधान के प्रावधानों के तहत अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म बदलता है, तो उन्हें उस पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन उनका आरोप है कि कांकेर क्षेत्र में आदिवासियों का ब्रेनवॉश कर उनका मतांतरण कराया जा रहा है।

देवेंद्र टेकाम का कहना है कि यीशु को मानने वाले आदिवासी अब अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन नहीं करते और नियमित रूप से चर्च जाते हैं। उनके मुताबिक, चर्च जाने के साथ ही वे खुद को ईसाई मानने लगते हैं, लेकिन चर्च से बाहर आने के बाद वे अपनी पहचान अनुसूचित जनजाति के रूप में बताते हैं और उससे जुड़े सरकारी लाभ लेते रहते हैं।

टेकाम का दावा है कि सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण का बड़ा हिस्सा इन्हीं लोगों को मिल रहा है। उनका सवाल है कि अगर ये लोग अल्पसंख्यक समुदाय में शामिल हो चुके हैं, तो फिर दस्तावेजों में सीधे तौर पर धर्म परिवर्तन क्यों नहीं कराते।

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आस्था का असर हर धर्म में, लालच का आरोप बेबुनियाद – क्लॉडियस

कांकेर में मसीही समाज के संरक्षक डॉ. प्रदीप क्लॉडियस पेशे से बाल रोग विशेषज्ञ हैं। गांवों में यीशु पर विश्वास करने से बीमारी ठीक होने के दावों पर डॉ. क्लॉडियस कहते हैं कि डॉक्टर होने के बावजूद वे इन अनुभवों को पूरी तरह खारिज नहीं करते।

उनका कहना है कि आस्था का असर सिर्फ यीशु पर भरोसा करने वालों तक सीमित नहीं है। देवी-देवताओं पर विश्वास करने से भी ऐसे ही अनुभव देखने को मिलते हैं। डॉ. क्लॉडियस बताते हैं कि अपने पेशेवर अनुभव में उन्होंने कई ऐसे मामले देखे हैं, जहां मरीज बड़े अस्पतालों से इलाज कराकर लौटे, फिर देवी-देवताओं के स्थानों पर गए और बाद में उनकी हालत में सुधार हुआ।

डॉ. क्लॉडियस यह भी कहते हैं कि मौजूदा माहौल में लोगों को यह कहकर डराया जा रहा है कि हिंदू धर्म खतरे में है, जबकि उनके मुताबिक हिंदू धर्म न पहले खतरे में था और न ही आज है।

ये तस्वीरें भी देखिए…

धर्मांतरित व्यक्ति का गांव में शव दफनाने को लेकर आदिवासी समाज ने विरोध किया था।

धर्मांतरित व्यक्ति का गांव में शव दफनाने को लेकर आदिवासी समाज ने विरोध किया था।

शव दफनाने को लेकर 2 पक्षों में हुए विवाद के बाद भीड़ ने चर्च में आग लगा दी थी।

शव दफनाने को लेकर 2 पक्षों में हुए विवाद के बाद भीड़ ने चर्च में आग लगा दी थी।

भीड़ को रोकने पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था। इस दौरान पत्थरबाजी में पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे।

भीड़ को रोकने पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था। इस दौरान पत्थरबाजी में पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे।

आदिवासी-ईसाई समुदाय के बीच झड़प में घर में तोड़फोड़ के बाद टूटी हुई दीवार।

आदिवासी-ईसाई समुदाय के बीच झड़प में घर में तोड़फोड़ के बाद टूटी हुई दीवार।

आदिवासी समाज के लोगों ने गांव में इस तरह का बोर्ड लगाया है।

आदिवासी समाज के लोगों ने गांव में इस तरह का बोर्ड लगाया है।

प्रभावित गांवों में भारी संख्या में फोर्स तैनात है।

प्रभावित गांवों में भारी संख्या में फोर्स तैनात है।

यीशु को मानने वाली रजाय वट्टी और उनका परिवार।

यीशु को मानने वाली रजाय वट्टी और उनका परिवार।

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कांकेर में धर्मांतरण से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…

आदिवासी-ईसाई विवाद से भड़की हिंसा की इनसाइड स्टोरी:जिस चर्च को डराकर बनाया, भीड़ ने उसे जलाया, यीशु को मानने वाले गांव छोड़कर जंगलों में छिपे

कांकेर के आमाबेड़ा और बड़े तेवड़ा इलाके में बने 3 चर्च और प्रार्थना भवनों में आगजनी, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ हुई थी। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था।

कांकेर के आमाबेड़ा और बड़े तेवड़ा इलाके में बने 3 चर्च और प्रार्थना भवनों में आगजनी, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ हुई थी। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था।

कांकेर के आमाबेड़ा पहुंचने से करीब डेढ़ किलोमीटर पहले सड़क किनारे लगा यह पोस्टर सबसे पहले नजर आता है। यही इलाका है, जहां बड़े तेवड़ा गांव में सरपंच ने अपने पिता के शव को बाड़ी में दफनाया। इसके बाद विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। पढ़ें पूरी खबर



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