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Home » Judo champion Yogita honored by the President | जूडो चैंपियन योगिता को राष्ट्रपति ने किया सम्मानित: दो-दो दिन तक भूखी रही, चक्कर भी आया और डर भी लगा लेकिन मैट पर सामने वाले को पता भी नहीं लगने दिया – Raipur News
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Judo champion Yogita honored by the President | जूडो चैंपियन योगिता को राष्ट्रपति ने किया सम्मानित: दो-दो दिन तक भूखी रही, चक्कर भी आया और डर भी लगा लेकिन मैट पर सामने वाले को पता भी नहीं लगने दिया – Raipur News

By adminDecember 28, 2025No Comments4 Mins Read
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नक्सल प्रभावित बस्तर के कोंडागांव जिले के फरसगांव से निकली 13 साल की योगिता मंडावी…नई दिल्ली में शुक्रवार को उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया। शनिवार को वे रायपुर पहुंचीं और कोंडागांव अपने पर

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चाचा को ये पता है कि योगिता ने कुछ बहुत बड़ा जीता है, जो कि उन्हें योगिता की टीचर मणि शर्मा ने बताया। दरअसल योगिता जब कुछ ही सालों की थी तब पिता को खो चुकी थी, 4 साल की उम्र में सर्पदंश की वजह से मां भी नहीं रहीं। तब से नानी के पास पली बढ़ी। कुछ दिनों में चाचा-चाची ने बालगृह में डाल दिया।

अनाथ होने का असर ऐसा था कि वहां डरी-सहमी योगिता दिनभर चुप-चाप बैठी रहती। न किसी से बोलती न ज्यादा बात करती। बालगृह में ही उसे मणि शर्मा अभिभावक के रूप में मिल गईं। वो बताती हैं कि योगिता छुप-छुपकर रोया करती थी। और इसी चीज ने उसे अपनी डर छिपाने का हुनर सिखा दिया। योगिता कहती हैं कि प्रतियोगिता के दौरान थोड़ा भी वजन बढ़ा होता है तो बाहर कर दिए जाते हैं।

हैदराबाद में जब नेशनल के लिए खेलने गई तब वजन थोड़ा ही ज्यादा था। इसे कम करने के लिए 2 दिन तक कुछ नहीं खाया। रनिंग और एक्सरसाइज की। चार किलो वजन घट गया। चक्कर भी आने लगे और डर भी लगने लगा। लेकिन जब मैट पर पहुंची तब ये सबकुछ बाहर ही छोड़ दिया। सामने वाले को इस चीज का जरा भी अंदाजा नहीं होने दिया।…बातचीत में योगिता ने अपने संघर्ष और उपलब्धियों के बारे में बताया। जिसके कुछ अंश ये हैं…

Q. बालिका गृह में आने के बाद जिंदगी कैसे बदली? – 25 जनवरी 2021 को चाचा-चाची मुझे बालिका गृह लेकर आए। शुरू में वहां भी मन नहीं लगता था। मैं बहुत चुप रहती थी। धीरे-धीरे माहौल बदला, पढ़ाई और एक्टिविटी शुरू हुईं। वहीं से मेरी जिंदगी ने नई दिशा ली।

Q. खेलों से जुड़ाव कैसे हुआ? – मणि शर्मा मैम हमें अलग-अलग खेल ट्राई करवाती थीं। पहले टेबल टेनिस खेली, लेकिन मन नहीं लगा। फिर जूडो खेली। जूडो खेलते ही मुझे अंदर से ताकत महसूस हुई। लगा कि यही मेरा खेल है।

Q. पहला बड़ा मुकाबला कब खेला? – पहला राज्य स्तरीय मुकाबला खेला, उसमें सिल्वर मेडल आया। उसी के बाद मैंने ठान लिया कि और मेहनत करूंगी। फिर स्टेट ओपन में गोल्ड आया।

Q. अब तक की प्रमुख उपलब्धियां? – तीन साल में सात नेशनल खेले हैं। 2023 में ओपन नेशनल और खेलो इंडिया में पांचवां स्थान मिला। 2024 में खेलो इंडिया में सिल्वर और 2025 में ब्रॉन्ज मेडल मिला। लखनऊ में खेलो इंडिया में प्रदर्शन के बाद मेरा एसएआई में चयन हुआ।

Q. अभी दिनचर्या कैसी है? – बहुत सख्त। सुबह 5 बजे उठना पड़ता है। रनिंग, जिम और फिर जूडो की ट्रेनिंग। शाम को दोबारा जूडो। कई बार बहुत थकान होती है, लेकिन रुकने का ऑप्शन नहीं होता।

Q. जूडो में सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है? – वजन कंट्रोल करना। कई बार मैच से पहले दो-दो दिन भूखा रहना पड़ता है। प्रैक्टिस के दौरान चक्कर भी आते हैं, लेकिन फाइट में पूरी ताकत झोंकनी होती है।

Q. पहली बार नेशनल खेलने का अनुभव? – केरल गई थी। पहली बार इतनी दूर ट्रेन से गई। बहुत खुशी हो रही थी। वहां पांचवां स्थान आया, लेकिन आत्मविश्वास बहुत बढ़ा।

Q. कम उम्र में अंडर-19 खेलने का अनुभव? – मैं 13 साल की थी और अंडर-19 में खेल रही थी। बड़े खिलाड़ियों को देखकर डर लगा था, लेकिन मैंने सोचा—मैट पर उतर गई हूं तो पूरा दम लगाऊंगी। वहां भी फिफ्थ रैंक आई।

Q. प्रधानमंत्री से मुलाकात हुई? – मैं हैदराबाद में एक प्रतियोगिता खेलने गई थी। वहीं हमें बताया गया कि सम्मान समारोह के लिए बुलाया गया है। समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि ‘ऐसे ही खेलते रहो, मेहनत करते रहो और इंडिया का नाम रोशन करो।’

Q. राष्ट्रपति से मुलाकात का अनुभव? – राष्ट्रपति जी से ज्यादा बातचीत का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने पुरस्कार देने के दौरान मुस्कुराकर शाबाशी दी। इतना कहना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

Q. जूडो ने आपको क्या सिखाया? – जूडो ने मुझे डर से बाहर निकाला। अपने से बड़े और भारी खिलाड़ी को गिराने से जो आत्मविश्वास आता है, वही जिंदगी में भी काम आता है।

Q. घर और परिवार की याद आती है? – हां, बहुत आती है। नानी और भाई से फोन पर बात हो जाती है। फोन ज्यादा नहीं मिलता, लेकिन बात हो जाए तो मन हल्का हो जाता है।

Q. आगे का लक्ष्य क्या है? – देश के लिए मेडल लाना है। साथ ही पढ़ाई जारी रखकर कलेक्टर बनना चाहती हूं। जूडो कभी नहीं छोड़ूंगी।

Q. अपने जैसे बच्चों के लिए क्या संदेश देंगी? – हालात चाहे जैसे हों, मेहनत और अनुशासन से रास्ता जरूर निकलता है। बड़ों की बात मानिए, टाइम का पालन कीजिए और हार मत मानिए।



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