MBBS सीट हथियाने 7 छात्रों ने बनवाए फर्जी सर्टिफिकेट, तहसीलदारों के सील-साइन जाली
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सरकारी मेडिकल कॉलेजों की एमबीबीएस की सीट हथियाने के लिए 7 छात्रों ने फर्जी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के सर्टिफिकेट लगाए। इनमें से 3 छात्राएं बिलासपुर की हैं। बाकी बलरामपुर, कोरबा, अंबिकापुर और भरतपुर-चिरमिरी से हैं। ये वे लोग हैं जो या तो दाखिला ले चुके थे या काउंसिलिंग में शामिल थे।
ये खुलासा चिकित्सा शिक्षा संचालनालय(सीएमई) के पत्र पर कलेक्टर्स की ओर करवाई गई जांच में हुआ है। इसमें पाया गया है कि सर्टिफिकेट फर्जी सील-साइन से जारी हुए। इनमें तहसील कार्यालयों के बाबुओं की संलिप्तता है। राज्य में साल 2019 से ईडब्ल्यूएस कोटा लागू हुआ, पर सर्टिफिकेट की इस तरह की जांच पहली बार हुई।
पड़ताल में सामने आया कि सीएमई को अगस्त में फर्स्ट राउंड काउंसिलिंग में ही ईडब्ल्यूएस कोटा के फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए कुछ छात्रों के शामिल होने की जानकारी मिली। आयुक्त शिखा राजपूत तिवारी ने काउंसिलिंग कमेटी को अलर्ट किया। 29 संदिग्ध छात्रों के दस्तावेजों को कलेक्टरों को जांच के लिए भेजा। इनमें से अब तक 23 की रिपोर्ट आ चुकी है। 6 की बाकी है। ये 6 छात्र मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे हैं।
कैसे बनते हैं ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट- तहसील कार्यालयों में ऑफलाइन आवेदन करना होता है। तहसीलदार प्रस्तुत दस्तावेजों की पटवारी के जरिए जांच कराते हैं। आवेदक आय, निवास, आईटीआर और सालाना आय 8 लाख रुपए से कम होने का शपथ पत्र देता है।

बड़ा सवाल: फर्जी सर्टिफिकेट कैसे बने? किसने और कितने बनाए? पड़ताल में इनके जवाब सामने आए
बिलासपुर से 3 फर्जी सर्फिटिकेट- पोर्टल में ब्लैंक पेपर अपलोड किया भास्कर रिपोर्टर पड़ताल के दौरान बिलासपुर पहुंचा, क्योंकि 7 में से 3 सर्टिफिकेट इसी जिले से जारी हुए थे। वहां संयुक्त कलेक्टर मनीष साहू ने इस मामले की जांच की। साहू ने बताया- मैंने जांच रिपोर्ट सौंप दी है, इसमें बाबू के खिलाफ जांच की सिफारिश की गई है। तीनों सर्टिफिकेट में तहसीलदार गरिमा सिंह के सील-साइन हैं।
जांच के दौरान साहू ने गरिमा सिंह को सर्टिफिकेट दिखाए, तो उन्होंने कहा कि ये मेरे दस्तखत नहीं है। सील भी ऑफिस की नहीं है। इसमें स्पेलिंग मिस्टेक है। भास्कर से गरिमा सिंह ने कहा- ‘सर्टिफिकेट के दस्तखत मेरे नहीं है। हां, मुझसे मिलते-जुलते हैं। इसके आवेदक उनके कार्यक्षेत्र का नहीं है। खुलासा यह भी हुआ कि विभागीय वेबसाइट पर ऑनलाइन सर्टिफिकेट अपलोड करने होते हैं। बाबू ने इस जगह पर ब्लैंक पेपर अपलोड किए। इस मामले में तहसील कार्यालय के बाबू प्रहलाद सिंह नेताम का नाम सामने आया है।’
डर के कारण छात्र दाखिला लेने नहीं पहुंचे शासकीय मेडिकल कॉलेज अंबिकापुर में ईडब्ल्यूएस कोटा से 2 छात्रों को एमबीबीएस की सीट अलॉट हुई थी। जांच में ये सर्टिफिकेट फर्जी पाए गए। जांच हो रही, फंस जाएंगे इस डर से ये छात्र दाखिला लेने ही नहीं पहुंचे।
छात्रा को बरगलाता रहा बाबू- सर्टिफिकेट सही है, मान्य है पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर में एक छात्रा ईडब्ल्यूएस कोटा सर्टिफिकेट से दाखिला पा चुकी थी, पर जांच में सर्टिफिकेट फर्जी निकला। छात्रा और उसकी मां को बाबू यही कहता रहा कि सर्टिफिकेट सही है। अंत में उसका दाखिला रद्द हो गया। छात्रा के नीट में 460+ नंबर थे। (जैसा- काउंसिलिंग कमेटी के अधिकारी ने भास्कर को बताया।)
यहां बने सर्टिफिकेट: बिलासपुर से 3, बलरामपुर, कोरबा, भरतपुर-मनेंद्रगढ़-चिरमिरी, सरगुजा से 1-1 (नोट- भास्कर छात्रों के भविष्य को देखते हुए नाम नहीं दे रहा है)
जांच में कुछ सर्टिफिकेट फर्जी मिले, उनके दाखिले रद्द ईडब्ल्यूएस कोटा में गड़बड़ियों को लेकर कुछ शिकायतें मिली थीं, जिसके बाद सभी संदिग्ध सर्टिफिकेट की कलेक्टर स्तर पर जांच करवाई गईं। जांच के दौरान कुछ सर्टिफिकेट फर्जी पाए गए हैं। ऐसे सभी छात्रों के दाखिले रद्द किए गए हैं। शिखा राजपूत तिवारी, आयुक्त, चिकित्सा शिक्षा
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