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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तेंदूपत्ता कारोबार पर 2% लाभ-साझेदारी वसूली वैध, करीब 30 करोड़ अब जैव विविधता बोर्ड को

हाईकोर्ट ने तेंदूपत्ता फॉरेस्ट लॉट की खरीद कीमत पर 2 प्रतिशत लाभ-साझेदारी (एबीएस) वसूली को लेकर कारोबारियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इस फैसले के साथ ही इस राशि की वसूली और उपयोग का रास्ता साफ हो गया है। विवाद के चलते वसूली गई रकम तेंदूपत्ता संघ के पास जमा रही थी, जिसे अब जैव विविधता बोर्ड को ट्रांसफर किया जाएगा।

जानकारी के अनुसार तेंदूपत्ता संघ में करीब 30 करोड़ रुपए जमा हैं। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब यह राशि जैव विविधता बोर्ड को मिलेगी। सबसे खास बात यह है कि 2 प्रतिशत की राशि पहले भी वसूली जा रही थी, लेकिन कारोबारी इसके खिलाफ कोर्ट में थे, जिसके कारण यह रकम तेंदूपत्ता संघ के पास ही जमा रह गई थी।

हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2026 को सभी संबंधित याचिकाएं खारिज करते हुए वसूली को वैध माना। कोर्ट ने कहा कि यह कोई नया टैक्स या बाद में बनाया गया वित्तीय बोझ नहीं है, बल्कि जैव विविधता कानून के तहत पहले से मौजूद लाभ-साझेदारी की व्यवस्था को लागू करना है।

तेंदूपत्ता कारोबारियों का तर्क था कि वे वनवासियों या आदिवासी संग्राहकों से सीधे तेंदूपत्ता नहीं खरीदते, बल्कि राज्य लघु वनोपज संघ की सरकारी नीलामी में फॉरेस्ट लॉट खरीदते हैं। इसलिए उन पर जैव विविधता कानून के तहत एबीएस लागू नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि 1964 का तेंदूपत्ता व्यापार कानून खरीद और व्यापार को नियंत्रित करता है, जबकि जैव विविधता अधिनियम जैव संसाधनों के संरक्षण और उनके व्यावसायिक इस्तेमाल से होने वाले लाभ के न्यायसंगत बंटवारे की व्यवस्था करता है। दोनों कानून अलग लेकिन पूरक हैं। सरकारी नीलामी के रास्ते खरीद होने से व्यावसायिक उपयोग पर एबीएस की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।

एबीएस की रकम का उद्देश्य सिर्फ सरकारी खाते में पैसा जमा करना नहीं है। इसका उपयोग उन क्षेत्रों में लोगों की बेहतरी के लिए किया जाएगा, जहां तेंदूपत्ता और दूसरी वनोपज से जैव संसाधनों का दोहन होता है। इन इलाकों में सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे विकास कार्य कराए जाएंगे।

यानी तेंदूपत्ता कारोबार से होने वाले व्यावसायिक लाभ का एक हिस्सा वापस उन क्षेत्रों की बेहतरी में लगाने की व्यवस्था बनेगी, जहां से ये जैव संसाधन मिलते हैं। तेंदूपत्ता कारोबार से अब हर साल औसतन 10 करोड़ रुपए जैव विविधता बोर्ड को मिलेंगे।

यह रकम तेंदूपत्ता ही नहीं, बल्कि दूसरी वनोपज के दोहन वाले इलाकों में रहने वाले लोगों की बेहतरी और वहां विकास के कामों पर खर्च की जाएगी। सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं से जुड़े काम इस राशि के उपयोग में शामिल रहेंगे।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब करीब 30 करोड़ रुपए जैव विविधता बोर्ड को ट्रांसफर किए जाने का रास्ता साफ हो गया है। इसके बाद हर साल तेंदूपत्ता कारोबार से मिलने वाली औसतन 10 करोड़ रुपए की राशि भी इसी व्यवस्था के तहत बोर्ड के पास पहुंचेगी।

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