बिलासपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2005 के एक बहुचर्चित मारपीट मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मामले की अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपियों की दोषसिद्धि (Conviction) को तो बरकरार रखा, लेकिन सजा के मामले में नरम रुख अपनाया। कोर्ट ने सभी अपीलकर्ताओं की जेल की सजा को उनके द्वारा पहले से काटी गई अवधि (एक माह से अधिक) तक ही सीमित कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में माना कि चूंकि यह मामला करीब 18 साल पुराना है और इसकी अपील भी साल 2008 से लंबित थी, इसलिए इतने लंबे समय बाद आरोपियों को दोबारा जेल भेजना न्यायोचित नहीं होगा। कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में न्याय के उद्देश्य की पूर्ति इसी से हो जाएगी।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी तीन साल तक की कड़ी सजा
इस मामले में जांजगीर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) ने 17 मार्च 2008 को फैसला सुनाया था। ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाते हुए सजा तय की थी।
धारा 147 व 148 (बलवा): एक-एक वर्ष का कारावास।
धारा 326/149 (गंभीर चोट): तीन वर्ष का कठोर कारावास और 2,500 रुपये जुर्माना (जुर्माना न देने पर दो माह का अतिरिक्त कारावास)।
धारा 325/149: दो वर्ष की सजा।
धारा 324/149 (दो मामले): एक-एक वर्ष की सजा और 500-500 रुपये जुर्माना।
धारा 323/149: छह माह के कारावास की सजा।
लंबा समय गुजरा, अब कठोर सजा देना ठीक नहीं
हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश ने समय के लंबे अंतराल को मुख्य आधार माना। कोर्ट ने टिप्पणी की कि घटना वर्ष 2005 की है और अपील पिछले 18 वर्षों से लंबित रही। इस दौरान आरोपी मानसिक और सामाजिक रूप से इस मुकदमे का दंश झेल चुके हैं।
साथ ही रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि सभी अपीलकर्ता पहले ही एक महीने से ज्यादा का समय जेल में बिता चुके हैं। इन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कौशल, बेलीस्थर, कामता प्रसाद, नेगीराम, दिनेश कुमार, सुनील कुमार, बबला, जुगुनू, दिलीप और बनवासी की अपील को आंशिक रूप से (Partially) स्वीकार कर लिया।
बलवे की धारा से बरी, जुर्माना देना होगा
हाईकोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में तकनीकी और कानूनी पहलुओं को देखते हुए सभी अपीलकर्ताओं को आईपीसी की धारा 147 और 148 (बलवा और घातक हथियार से बलवा) के आरोपों से बरी कर दिया है।
हालांकि, मारपीट की अन्य धाराओं (धारा 323, 324 और 325) के तहत उनकी दोषसिद्धि को सही ठहराया गया है। कोर्ट ने साफ किया कि सजा में संशोधन: आरोपियों द्वारा पहले से काटी गई जेल अवधि को ही उनकी अंतिम सजा माना जाएगा, यानी उन्हें अब दोबारा जेल नहीं जाना होगा।
जुर्माने की शर्त: यदि आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना अब तक जमा नहीं किया है, तो उन्हें वह राशि निचली अदालत के निर्देशानुसार अनिवार्य रूप से जमा करनी होगी।
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