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राजनांदगांव में नवंबर में हुए उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के दौरे के लिए बनाए गए हेलीपैड निर्माण में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। दस्तावेजों के अनुसार पूरा काम और उसकी प्रशासनिक प्रक्रिया दौरे के बाद कागजों में पूरी की गई। पहले हेलीपैड बनाया गया और उप राष्ट्रपति के दौरे के बाद इसके निर्माण के लिए टेंडर जारी किया गया। यहां कागजी प्रक्रिया उल्टी दिशा में चली। टेंडर, माप, स्वीकृति और भुगतान सभी प्रक्रियाएं बाद में पूरी होने से निर्माण और भुगतान की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत निकाले गए दस्तावेजों में इसकी सारी जानकारी मिली है। लोक निर्माण विभाग द्वारा उपराष्ट्रपति के 5 नवंबर 2025 के दौरे के लिए तीन हेलिपैड रक्षित आरक्षी केंद्र में बनाए गए थे। लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि इन हेलीपैड से जुड़ी प्रक्रिया नियमों के विपरीत तरीके से पूरी की गई। दौरे के 12 दिन बाद 17 नवंबर 2025 को हेलिपैड निर्माण के लिए वर्क ऑर्डर जारी किया गया। इसके बाद 26 नवंबर को कार्य की अनुशंसा, 4 दिसंबर को माप पुस्तिका में एंट्री और 24 दिसंबर को तकनीकी स्वीकृति जारी की गई। हैरानी की बात यह है कि 8 जनवरी 2026 को, यानी दौरे के 63 दिन बाद एसडीओ द्वारा इसका वेरिफिकेशन किया गया। सबसे गंभीर पहलू यह है कि हेलिपैड निर्माण के लिए तकनीकी स्वीकृति रोड एसओआर से दी गई, जबकि वास्तविक कार्य और वर्क ऑर्डर बिल्डिंग एसओआर से कराया गया, जो नियमों के खिलाफ है। विशेषज्ञों के अनुसार हेलिपैड जैसे भारी लोड वाले निर्माण के लिए रोड एसओआर जरूरी होता है, ताकि संरचना मजबूत रहे और हेलिकॉप्टर के वजन से धंसने का खतरा न हो। शिकायत दोगुने भुगतान की भी
वित्तीय अनियमितता भी सामने आई है। शिकायत की गई है कि 7–8 लाख रुपए के काम के लिए 13 लाख रुपए का भुगतान किया गया, जो वास्तविक लागत से लगभग दोगुना है। साथ ही बिना अनुमति 1 प्रतिशत पीजी कटौती भी नियमों के विरुद्ध बताई गई है। पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब उपराष्ट्रपति जैसे वीवीआईपी का दौरा था, तब निर्माण और उसकी जांच पहले क्यों नहीं की गई। यदि किसी तरह की तकनीकी खामी के कारण हादसा हो जाता, तो यह एक बड़ी सुरक्षा चूक साबित हो सकती थी। प्रकरण में मैंने ईई को तलब किया है
इस संबंध में जानकारी मुझे भी मिली है। प्रकरण में मैंने ईई को तलब किया है। उनसे पूरी जानकारी लेने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। हालांकि ऐसा नहीं होना चाहिए। -बीके पटोरिया, अधीक्षण अभियंता, दुर्ग
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