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धान की खेती की तैयारियां शुरू हो चुकी है, लेकिन छत्तीसगढ़ के अधिकांश किसान खेत की जुताई में ऐसी गलतियां कर रहे हैं, जो फसल उत्पादन को सीधे प्रभावित करती है। कई किसान आवश्यकता से अधिक जुताई कर देते हैं, जबकि कुछ किसान बहुत सूखी या अत्यधिक गीली मिट्टी में जुताई कर देते हैं। इससे मिट्टी की संरचना खराब होती है, नमी तेजी से खत्म होती है और खेती की लागत भी बढ़ जाती है। इसे बेहत गंभीरता से समझने की आवश्यकता है कि जुताई केवल परंपरागत प्रक्रिया नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तकनीक है। जुताई की गहराई, समय और मिट्टी में मौजूद नमी का सीधा असर पौधों की जड़ों के विकास और उत्पादन पर पड़ता है। सही तरीके से जुताई करने पर धान की पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है, जबकि लगातार गलत जुताई करने से उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है। 5 सावधानियां जिनका ख्याल रखना जरूरी… वैज्ञानिक तरीके से किसान ऐसे करें जुताई 1. गर्मी में हल से करें पहली गहरी जुताई
– मिट्टी पलटने वाले हल या रिवर्सेबल प्लाऊ से गहरी जुताई करें।
– इससे खरपतवार, कीट और रोगों के स्रोत नष्ट होते हैं।
– इससे मिट्टी भुरभुरी बनती है और वर्षा का पानी बेहतर तरीके से अवशोषित होता है। 2. इसके बाद 1 से 2 हल्की जुताई पर्याप्त – पहली जुताई के बाद कल्टीवेटर, देशी हल या रोटावेटर से एक- दो बार हल्की जुताई करें।
– इससे मिट्टी समतल और बारीक हो जाती है, जो धान रोपाई के लिए उपयुक्त रहती है। 3. न ज्यादा सूखी, न ज्यादा गीली मिट्टी – बहुत सूखी मिट्टी में जुताई करने से बड़े-बड़े ढेले बन जाते हैं।
– अधिक गीली मिट्टी में जुताई करने से मिट्टी दब जाती है और उसकी संरचना खराब हो जाती है।
– हल्की नमी वाली अवस्था जुताई के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है। 4. जरूरत से ज्यादा जुताई से बचें – बार-बार जुताई करने से मिट्टी की गुणवत्ता घटती है और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इससे बाद की फसलों को नुकसान होता है।
– जरूरत के अनुसार ही जुताई करें। 5. खेत के अनुसार चुनें सही कृषि यंत्र – मिट्टी पलटने वाला हल, कल्टीवेटर, रोटावेटर, पाटा और लेजर लैंड लेवलर जैसे यंत्र खेत की स्थिति के अनुसार उपयोग किए जाने चाहिए।
– समतल खेत में पानी का बेहतर प्रबंधन होता है, धान की बढ़वार अच्छी रहती है। वे तरीके, जिससे मिट्टी की पहली जुताई का समय पहचानें 1. मुट्ठी परीक्षण (Hand Test) – खेत की 10–15 सेमी गहराई से मिट्टी लेकर मुट्ठी में दबाएं।
– यदि मिट्टी का गोला बन जाए, लेकिन हल्के दबाव से टूट भी जाए, तो नमी जुताई के लिए उपयुक्त है।
– यदि गोला बिल्कुल न बने, तो मिट्टी बहुत सूखी है।
– यदि गोला चिपचिपा रहे और हाथ में चिपके, तो मिट्टी गीली है। 2. हल में मिट्टी न चिपके – जुताई के दौरान मिट्टी फाल या रोटावेटर में चिपकने लगे तो समझिए नमी अधिक है। 3. पैर का निशान देखें – खेत में चलने पर पैर 1–2 सेमी तक धंसे व पानी न निकले, तो नमी सामान्यतः उपयुक्त मानी जाती है।
– यदि पैर के साथ पानी ऊपर आ जाए, तो खेत अभी ज्यादा गीला है। ज्यादा जुताई के नुकसान – मिट्टी का कार्बनिक कार्बन घटता है, इससे मिट्टी की उर्वरता व जल धारण क्षमता कम हो जाती है।
– मिट्टी की संरचना खराब होती है। मिट्टी भुरभुरी रहने के बजाय सख्त या पपड़ीदार हो सकती है।
– बार-बार जुताई से मिट्टी की सतह खुल जाती है, जिससे पानी का वाष्पीकरण बढ़ता है।
– सूक्ष्मजीवों की संख्या घटती है, मिट्टी में रहने वाले लाभकारी जीवाणु, फफूंद और केंचुए प्रभावित होते हैं।, इससे पोषक तत्वों का प्राकृतिक चक्र कमजोर पड़ता है।
– मिट्टी का कटाव बढ़ता है, खुली और ढीली मिट्टी बारिश या हवा से आसानी से बह सकती है, उपजाऊ ऊपरी परत का नुकसान होता है।
– उत्पादन पर असर, जड़ोंं का विकास प्रभावित हो सकता है, पोषक तत्वों और नमी की उपलब्धता घटने से उपज कम हो सकती है।
– खेती की लागत बढ़ती है, अधिक जुताई का मतलब अधिक डीजल, मशीन और श्रम खर्च। अंधाधुंध जुताई से खर्च बढ़ा, तकनीक से सुधरी खेती कोरिया के रनई के किसान हरिओम साहू बताते हैं कि पहले हमारी सोच थी कि जितनी ज्यादा बार ट्रैक्टर चलाएंगे, खेत उतना ही अच्छा तैयार होगा। लेकिन इससे सिर्फ खर्च बढ़ता था और खेत की नमी भी गायब हो जाती थी। अब हमने तरीका बदला है। गर्मी में ही पहली गहरी जुताई करते हैं, जिससे खरपतवार और कीड़े खत्म हो जाते हैं। मिट्टी में सही नमी देखकर ही कल्टीवेटर चला रहे हैं। तकनीक से धान की पैदावार भी बढ़ रही है।
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