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शहर के थानों में पॉकेट गवाह यानी तयशुदा गवाहों का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय होने का खुलासा हुआ है। स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया है कि पुलिस के बुलाते ही कुछ तयशुदा लोग तुरंत पहुंच जाते हैं। घटनास्थल पर मौजूद न रहने के बावजूद ये लोग जब्ती और पंचनामा के कागजात पर गवाह बनकर हस्ताक्षर करते हैं। कई मामलों में एक ही व्यक्ति बार-बार गवाह के रूप में सामने आया है, जिससे पुलिस जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्टिंग के दौरान ऐसे कुछ लोगों से संपर्क किया गया जो खुद को नियमित गवाह बताते हैं। बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि यह गवाही अक्सर आपसी पहचान, रसूख या छोटे-मोटे पैसों के लेन-देन के आधार पर तय होती है। कई मामलों में इन्हें थाने से फोन करके बुलाया जाता है और वे बिना घटनास्थल की वास्तविक जानकारी के ही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं। पुलिस रिकॉर्ड खंगालने पर ऐसे कई नाम सामने आए हैं, जो अलग-अलग थानों के दर्जनों मामलों में गवाह बने हुए हैं। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार एक ही व्यक्ति का गवाह बनना कोर्ट में संदेह पैदा करता है और बचाव पक्ष इसका फायदा उठाकर केस को कमजोर कर देता है। घटनास्थल न हो तो गवाही कोर्ट में नहीं टिकती
पॉकेट गवाह की प्रथा न्याय प्रक्रिया को कमजोर करती है। यदि गवाह मौके पर मौजूद नहीं होता, तो उसकी गवाही कोर्ट में टिक नहीं पाती और बचाव पक्ष इसे आसानी से चुनौती देता है। गवाह की विश्वसनीयता आपराधिक मामले की रीढ़ होती है। -विनय दुबे, अधिवक्ता बिलासपुर नियमों के तहत होती है कार्रवाई
गवाहों की उपलब्धता एक व्यावहारिक चुनौती होती है, लेकिन नियमों के तहत ही कार्रवाई की जाती है। यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। -रजनेश सिंह, एसएसपी बिलासपुर
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