तकनीकी संदेह का लाभ लेकर निचली अदालत से छूटा था हत्यारा; हाई कोर्ट ने ‘साक्ष्य अधिनियम’ का हवाला देकर पलटा था फैसला, अब सुको के आदेश पर सरेंडर …और पढ़ें
Publish Date: Mon, 18 May 2026 09:37:21 AM (IST)Updated Date: Mon, 18 May 2026 09:37:21 AM (IST)
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की युगलपीठ द्वारा नवविवाहिता ममता रजक की संदिग्ध मौत के मामले में आरोपित पति को दी गई उम्रकैद और 10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने यथावत रखा है। सुको के आदेश पर आरोपित पति ने कोर्ट में सरेंडर किया। इसके बाद उसे जेल दाखिल किया गया।
प्रकरण के अनुसार, वर्ष 2007 में विवाह के दो वर्ष के भीतर ही ससुराल के बंद कमरे में ममता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। चकरभाटा पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डाक्टर ने स्पष्ट किया था कि मृतका के शरीर पर चोटें थीं और मौत का कारण गला घोंटना था।
निचली अदालत ने वर्ष 2010 में तकनीकी संदेहों का लाभ देते हुए आरोपितों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य शासन और मृतका के पिता ने अपील दायर की थी। आठ अक्टूबर 2025 को उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों का पुनः विधिक परीक्षण कर पाया कि चूंकि मृतका अपने पति के साथ रह रही थी, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत पति पर परिस्थितियों को स्पष्ट करने का विधिक दायित्व था, जिसमें वह पूरी तरह विफल रहा।
हाई कोर्ट ने दोषी पति दीपनारायण रजक को एक महीने के भीतर न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए थे। इस फैसले को आरोपित ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुकों ने आरोपित पति को सरेंडर करने का आदेश दिया था। 12 मई को आरोपित पति दीपनारायण ने जिला न्यायालय में सरेंडर किया। पुलिस ने उसे कोर्ट के आदेश पर जेल भेज दिया है।