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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षक एलबी संवर्ग की पेंशन पात्रता के लिए सेवा अवधि की गणना से जुड़े महत्वपूर्ण मामले राज्य सरकार की रिट अपील खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि सिंगल बेंच ने सरकार के अधिकार क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं किया था, बल्कि उसे एक आदर्श नियोक्ता की तरह निर्णय लेने का अवसर दिया था। डिवीजन बेंच ने यह भी कहा कि यह किसी एक कर्मचारी का नहीं, बल्कि कर्मचारियों के पूरे वर्ग से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। इस विषय पर शासन स्तर पर स्पष्ट और तर्कसंगत नीति बनने से प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ेगी और अनावश्यक मुकदमेबाजी पर भी रोक लगेगी। दरअसल, व्याख्याता एलबी परमेश्वर प्रसाद जायसवाल समेत अन्य शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें कहा था कि उन्होंने अपनी सेवाएं शिक्षाकर्मी के रूप में शुरू की थीं और बाद में 1 जुलाई 2018 को उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग में नियमित शासकीय सेवा में समाहित कर लिया गया। वर्तमान व्यवस्था के तहत उनकी पेंशन पात्रता के लिए सेवा अवधि की गणना समावेशन की तिथि 1 जुलाई 2018 से की जा रही है। इससे वे 2028 से पहले पेंशन के पात्र नहीं हो पा रहे हैं, जबकि शिक्षाकर्मी के रूप में वे एक दशक से अधिक समय तक राज्य के अधीन सेवाएं दे चुके हैं। सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ शासन की अपील
इस मामले में 23 जनवरी 2026 को सिंगल बेंच ने सरकार को कोई सीधा आदेश देने के बजाय मामले को पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार के पास भेजा था। अदालत ने कहा था कि पेंशन एक कल्याणकारी व्यवस्था है और मर्जर से पहले कर्मचारियों द्वारा दी गई लंबी सेवाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा- सिंगल बेंच ने पुनर्विचार का दिया था आदेश
सिंगल बेंच के इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने रिट अपील दायर करते हुए तर्क दिया था कि यह मुद्दा पहले ही तय हो चुका है और अदालत का आदेश पुराने मामले को फिर से खोलने जैसा है। हालांकि, डिवीजन बेंच ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सिंगल बेंच ने न तो किसी नीति में बदलाव किया और न ही सीधे पेंशन देने का आदेश दिया, बल्कि केवल सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने के लिए कहा था।
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