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छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक अनोखी शादी की परंपरा देखने को मिली, जिसे देखकर लोग हैरान रह गए। यहां नई दुल्हन के घर में प्रवेश से पहले दुल्हन और दूल्हे को अंगारों पर चलकर सात फेरे लेने पड़ते हैं। यह परंपरा गंधेल गोत्र के परिवारों में कई सालों से चली आ रही है। सोमवार को भूपदेवपुर थाना क्षेत्र के बिलासपुर गांव में भी यह रस्म पूरी की गई। रविवार को भूपदेवपुर थाना क्षेत्र के बिलासपुर गांव में रहने वाला जयप्रकाश राठिया की शादी बाड़ादरहा गांव में रहने वाली पुष्पा राठिया के साथ संपन्न हुआ। बारात सोमवार को वापस लौटी, लेकिन उससे पहले गंधेल गोत्र में अंगार पर चल कर सात फेरे लेने वाले अनोखे रस्म का आयोजन किया गया। जयप्रकाश के पिता मेहत्तर राठिया ने बताया कि नई दुल्हन के आगमन से पहले पहले पूरा परिवार उपवास रखता है। रविवार रात से लेकर सोमवार सुबह 8 बजे तक, जब तक बहू घर नहीं पहुंच गई, तब तक परिवार के किसी भी सदस्य ने अन्न तो दूर, पानी की एक बूंद भी नहीं पिया। गांव पहुंचने पर पहले दूल्हा-दुल्हन का स्वागत किया गया, उन्हें नए वस्त्र और आभूषण भेंट किए गए और फिर शुरू हुई अग्नि परीक्षा की तैयारी। जैसे ही दूल्हा-दुल्हन मंडप के पास पहुंचे, तब यहां का पूरा माहौल बदल गया। मंडप को चारों तरफ से कपड़ों से ढंक दिया गया। अंगारो पर चलकर लिए सात फेरे
इस दौरान दूल्हे के पिता मेहत्तर राठिया पर कथित रूप से देवता का प्रवेश हुआ। इसी स्थिति में उन्होंने चूल्हे से जलते हुए लाल अंगार लाकर मंडप के बीचों-बीच बिछा दिए और खुद उन दहकते अंगारों पर नाचने लगे। इसके तुरंत बाद, उन्हीं अंगारों पर दूल्हा और दुल्हन ने हाथ थामकर सात फेरे लिए। इस अनोखी परंपरा में किसी को कोई चोट तक नहीं पहुंची। यह भी बताया जा रहा है कि इस दौरान दो बकरो की बलि भी दी जाती है। बारात के प्रस्थान-आगमन पर पूजा करते हैं
राठिया परिवार का मानना है कि अग्नि पर चलना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पवित्रता का प्रतीक है। मान्यता है कि जो जोड़ा अंगारों पर चलकर घर में प्रवेश करता है, वह जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को मिलकर सहने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। मान्यता यह है कि बारात के प्रस्थान और आगमन पर गांव के प्राचीन शिव मंदिर में पूजा करना अनिवार्य है। जयप्रकाश की बारात ने भी इसी नियम का पालन किया। मंदिर में नारियल फोड़कर व महादेव का आशीर्वाद लेकर वैवाहिक कार्यक्रम की अंतिम रस्में पूरी की गईं। 100 साल से अधिक समय से कर रहे
गांव के दामेश पटेल ने जानकारी दी कि बिलासपुर गांव में गंधेल गोत्र के केवल दो ही परिवार निवास करते हैं। यह परंपरा इन्हीं परिवारों में पिछले करीब 100 से अधिक वर्षों से चली आ रही है। परिवार के बुजुर्ग भी यह नहीं बता पाते कि इसकी सटीक शुरुआत कब से हुई, लेकिन पूर्वजों के द्वारा चलायी जा रही, इस परपंरा को लगातार निभाया जा रहा है। पूर्वजों के समये से चली आ रही परंपरा
गांव के दीक्षण यादव ने बताया कि बुजूर्गों के रिवाज को चला रहे हैं। बारात से वापस होते है तो वधु को बोल दिया जाता है कि कुछ खाना पानी नहीं करना। कुछ खा कर आओगे तो नुकसान होगा। यहां आने के बाद बहु को बाहर में रखे रहते हैं, बैगा के द्वारा पूजा पाठ चलता है। पूजा के बाद बहु को बुलाते हैं और फिर यह परंपरा को पूरी की जाती है। बैगा भी राठिया परिवार से होता है और बकरे की बलि दी जाती है। अंगार में चलते हैं, लेकिन कोई जलता नहीं है।
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