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भास्कर न्यूज | राजनांदगांव जिले में रसोई गैस की सप्लाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। नए नियमों के फेर में जहां आम उपभोक्ता परेशान हैं, वहीं कॉमर्शियल सिलेंडरों की किल्लत ने होटल और कैटरिंग व्यवसाय की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि बुकिंग के 15 दिन बीत जाने के बाद भी घरों तक सिलेंडर नहीं पहुंच रहे, लोगों को एजेंसियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कॉमर्शियल सिलेंडर की पर्याप्त सप्लाई नहीं होने से होटल-ढाबा संचालकों के पास कोई विकल्प नहीं है। इससे उनकी ग्राहकी और कारोबार प्रभावित हो गया। शादी वाले घरों में सिलेंडर नहीं मिलने मेनू में कटौती करनी पड़ रही। इससे कैटरिंग व्यवसाय भी प्रभावित है। इन दिनों सिर्फ स्कूल-कॉलेजों के मेस, कैंटीन और अस्पतालों को कॉमर्शियल सिलेंडर मिल रहा। होटल वाले लकड़ी-कोयले,इलेक्ट्रॉनिक कुकिंग मशीन से काम चला रहे। होटल ढाबों में परोसे जाने वाले व्यंजन इसमें तैयार करना संभव नहीं है। दावा : 25 दिन में डिलीवरी इंतजार 15 दिन और बढ़ा प्रशासन और गैस एजेंसियों ने 25 और 30 दिन की बुकिंग के बाद सामान्य ढंग से डिलीवरी का दावा है कि लेकिन ज्यादातर उपभोक्ताओं तक बुकिंग के 10 से 15 दिन बाद भी गैस नहीं पहुंच रही है। वहीं कई ऐसे उपभोक्ता हैं, जिन्हें ओटीपी ही जारी नहीं हो सकी है। जिसकी वजह से निर्धारित समय में बुकिंग के बाद भी लोगों को परेशान होना पड़ रहा है। लोग बार-बार एजेंसियों में पहुंचकर सिलेंडर की जानकारी ले रहे हैं और परेशान हो रहे हैं। ^कॉमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई पर्याप्त नहीं है, जिसके कारण होटलों में दिक्कत आ रही है। घरेलू सिलेंडरों की डिलीवरी समय पर करने के निर्देश एजेंसियों को दिए गए हैं। उपभोक्ता पैनिक न हों, व्यवस्था सुधारी जा रही है। -रवींद्र सोनी, खाद्य अधिकारी सिलेंडर के खाली होते ही तत्काल बुकिंग करा रहे नए नियम के मुताबिक सिंगल सिलेंडर कनेक्शन वाले 25 दिन और डबलसिलेंडर कनेक्शन वाले 30 दिन बाद ही दोबारा बुकिंग कर सकते हैं। आम परिवार में सिलेंडर 35-40 दिन चलता है, लेकिन लोग समय पूरा होते ही बुकिंग कर रहे हैं। इंडेन गैस एजेंसी के संचालक नरेंद्र डाकलिया ने बताया कि कॉमर्शियल गैस की आवक कम होने से होटल प्रभावित हैं, लेकिन घरेलू गैस की डिलीवरी सामान्य करने के प्रयास जारी है। शादियों के इस सीजन में गैस की किल्लत सबसे बड़ी बाधा बन गई है। डोसा, चाऊमीन और मंचूरियन जैसे व्यंजनों के लिए गैस के ऊंचे फ्लेम की जरूरत होती है, जो अब सिलेंडरों की कमी के कारण संभव नहीं हो पा रहा। मजबूरी में कैटरर्स और परिवार वाले मेनू में कटौती कर रहे हैं। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के कार्ड से सिलेंडर जुटाने की कोशिशें भी नाकाम हो रही हैं। ज्यादातर घरों में लकड़ी के पारंपरिक चूल्हों से ही कार्यक्रम निबटाए जा रहे हैं। इस सबके फेर में मनपसंद व्यंजन भी संबंधित परिवार वाले नहीं बनवा पा रहे हैं। क्योंकि संकट की स्थिति है।
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