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Home » ‘मौसेरी बहन से शादी हिंदू मैरिज एक्ट में अवैध…’, CG हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कोई भी प्रथा कानून से ऊपर नहीं
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‘मौसेरी बहन से शादी हिंदू मैरिज एक्ट में अवैध…’, CG हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कोई भी प्रथा कानून से ऊपर नहीं

By adminMay 4, 2026No Comments2 Mins Read
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03 05 2026 hindu marriage act cg high court
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का निर्णय पलट दिया। मामला जांजगीर-चांपा जिले से जुड़ा है। …और पढ़ें

Publish Date: Sun, 03 May 2026 11:44:48 AM (IST)Updated Date: Sun, 03 May 2026 11:44:48 AM (IST)

'मौसेरी बहन से शादी हिंदू मैरिज एक्ट में अवैध...', CG हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कोई भी प्रथा कानून से ऊपर नहीं
मौसेरी बहन से विवाह अवैध : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

HighLights

  1. मौसेरे भाई-बहन की शादी को अमान्य घोषित
  2. हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलट दिया
  3. जांजगीर-चांपा जिले में 2018 में हुआ था विवाह

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मौसेरे भाई-बहनों के बीच विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत प्रतिषिद्ध नातेदारी में आता है और इसे कानूनन शून्य माना जाएगा। इस फैसले से संबंधित फैमिली कोर्ट का पूर्व आदेश निरस्त कर दिया गया है।

जस्टिस की पीठ ने सुनाया फैसला

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय जायसवाल की पीठ ने जांजगीर-चांपा जिले के मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया जिसमें विवाह को सामाजिक प्रथा के आधार पर वैध माना गया था।

क्या था मामला?

मामला वर्ष 2018 का है, जब जांजगीर-चांपा जिले के एक युवक ने अपनी मौसेरी बहन से विवाह किया था। बाद में दोनों के बीच वैवाहिक विवाद उत्पन्न हो गया। पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की थी, यह तर्क देते हुए कि दोनों की माताएं सगी बहनें हैं।

फैमिली कोर्ट का पुराना फैसला

फैमिली कोर्ट ने अपने निर्णय में स्थानीय सामाजिक प्रथा और पटेल समाज में “ब्रह्म विवाह” की परंपरा का हवाला देते हुए विवाह को वैध माना था। पत्नी पक्ष ने भी तर्क दिया था कि यह विवाह सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ है, इसलिए पति जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई थी।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी सामाजिक प्रथा को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है जब वह प्राचीन, निरंतर और सार्वजनिक नीति के अनुरूप हो। कोर्ट ने कहा कि प्रतिषिद्ध नातेदारी में किया गया विवाह कानूनन मान्य नहीं हो सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि विवाह शून्य होने के बावजूद पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार बना रहेगा।

कानूनी दृष्टि से अहम फैसला

यह निर्णय पारिवारिक और सामाजिक प्रथाओं के बीच कानूनी सीमा को स्पष्ट करता है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।



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