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Home » महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का कार्यकाल 9 महीने बढ़ा:छत्तीसगढ़-ओडिशा के बीच 44 साल पुराना है विवाद, 2027 में फैसले की उम्मीद
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महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का कार्यकाल 9 महीने बढ़ा:छत्तीसगढ़-ओडिशा के बीच 44 साल पुराना है विवाद, 2027 में फैसले की उम्मीद

By adminApril 11, 2026No Comments4 Mins Read
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छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच दशकों से चल रहे महानदी जल विवाद को लेकर केंद्र सरकार ने महानदी जल विवाद ट्रिब्यून का कार्यकाल 9 महीने बढ़ाते हुए 13 जनवरी 2027 तक कर दिया है। अब सभी की नजरें 2027 की शुरुआत पर टिकी हैं, जब महानदी जल बंटवारे पर बहुप्रतीक्षित फैसला सामने आ सकता है। 1983 से शुरू हुआ विवाद, 2018 में बना ट्रिब्यूनल महानदी जल बंटवारे को लेकर विवाद की शुरुआत 1983 में हुई थी, जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं था और यह मामला मध्य प्रदेश और ओडिशा के बीच था। समय के साथ कई नीतियां और समझौते बने, लेकिन उनका प्रभावी पालन नहीं हो सका। विवाद ने 2016 में गंभीर रूप लिया, जब ओडिशा सरकार ने केंद्र से हस्तक्षेप की मांग करते हुए अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद 12 मार्च 2018 को केंद्र ने ट्रिब्यूनल का गठन किया। बातचीत विफल, तब बना न्यायाधिकरण केंद्र सरकार ने पहले बातचीत के जरिए समाधान निकालने के लिए एक नेगोशिएशन कमेटी बनाई थी, जिसने मई 2017 में रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में बताया गया कि ओडिशा की भागीदारी नहीं होने के कारण सहमति नहीं बन सकी और विवाद बातचीत से सुलझना संभव नहीं है। इसके बाद ट्रिब्यूनल गठन का रास्ता साफ हुआ। कामकाज में आई रुकावटें ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया कई बार बाधित हुई। कोरम की कमी, प्रशासनिक कारणों और पूर्व अध्यक्ष A. M. Khanwilkar के इस्तीफे से काम प्रभावित हुआ। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के चलते भी सुनवाई और जांच प्रक्रिया में देरी हुई, जिसके कारण समय-सीमा बार-बार बढ़ानी पड़ी। ट्रिब्यूनल ने किया ग्राउंड सर्वे इस विवाद की जांच के लिए ट्रिब्यूनल की टीम ने दो चरणों में रायपुर, बिलासपुर और कोरबा जिलों का दौरा कियाथा। इस दौरान महानदी और हसदेव नदी पर बनी जल परियोजनाओं का निरीक्षण किया गया। साथ ही छत्तीसगढ़ और ओडिशा के अधिकारियों से विस्तृत डेटा और तकनीकी जानकारी भी ली गई, ताकि वास्तविक स्थिति का आकलन किया जा सके। ओडिशा का पक्ष ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में महानदी और उसकी सहायक नदियों पर बनाए गए बांधों और बैराजों के कारण पानी का प्राकृतिक प्रवाह कम हुआ है। इससे खासकर गैर-मानसून सीजन में हीराकुंड बांध में जलभराव घट गया है। राज्य का कहना है कि इससे खेती, उद्योग और पेयजल आपूर्ति प्रभावित हो रही है और नदी के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ का पक्ष छत्तीसगढ़ सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि हीराकुंड बांध में तय सीमा से अधिक पानी का उपयोग किया जा रहा है। राज्य का दावा है कि महानदी में बहने वाले पानी का 80-90% हिस्सा शिवनाथ और हसदेव जैसी सहायक नदियों से आता है, जो छत्तीसगढ़ में स्थित हैं। ऐसे में जल बंटवारे में राज्य के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। पांच राज्यों की लाइफलाइन महानदी का उद्गम धमतरी जिले के सिहावा पर्वत से होता है और इसकी लंबाई करीब 851 किलोमीटर है। यह नदी छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड से होकर बहती है और अंत में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। नदी का 53% कैचमेंट एरिया छत्तीसगढ़ और 46.5% ओडिशा में है, लेकिन जल प्रवाह में बड़ा योगदान छत्तीसगढ़ की नदियों का माना जाता है। अर्थव्यवस्था और जीवन से जुड़ा मामला महानदी दोनों राज्यों के लिए जीवनरेखा है। छत्तीसगढ़ में इसे “लाइफलाइन” कहा जाता है, वहीं ओडिशा में सिंचाई, बिजली उत्पादन और उद्योग इसके पानी पर निर्भर हैं। ऐसे में ट्रिब्यूनल का फैसला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण होगा। 2027 में फैसले की उम्मीद ट्रिब्यूनल को मिला 9 महीने का अतिरिक्त समय इस विवाद को अंतिम रूप देने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब सभी की नजरें 2027 की शुरुआत पर टिकी हैं, जब महानदी जल बंटवारे पर बहुप्रतीक्षित फैसला सामने आ सकता है।



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