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धान की पारंपरिक खेती के लिए पहचाने जाने वाले रायगढ़ जिले में करीब चार दशक पहले अनानास उगाना अकल्पनीय प्रयोग माना जाता था। उस दौर में अंचल के अधिकांश किसान सिर्फ धान और पारंपरिक रबी फसलों तक सीमित थे। लेकिन साल्हेओना गांव के एक प्रगतिशील किसान ने लीक से हटकर ऐसी राह बनाई, जो आज छत्तीसगढ़ में गैर-पारंपरिक और वैकल्पिक खेती का एक जीवंत मॉडल बन चुकी है। रथयात्रा मेले से महज एक पौधे को खरीदकर शुरू किया गया यह सफर आज 2 एकड़ में फैले घने अनानास बाग में बदल चुका है। साल्हेओना गांव के 74 वर्षीय बुजुर्ग प्रगतिशील किसान अरुण कुमार साव बताते हैं कि करीब 40 साल पहले वे स्थानीय रथयात्रा मेले में गए थे। वहां उन्होंने खाने के लिए एक अनानास खरीदा। फल के ऊपरी हिस्से में मौजूद हरी पत्तियों और कली को देखकर उन्होंने उसे फेंकने के बजाय एक प्रयोग के तौर पर अपने घर के पास की जमीन में रोप दिया। अनुकूल वातावरण पाकर कुछ समय बाद उस एकल पौधे से नए छोटे पौधे (सकर्स) निकलने शुरू हो गए। अरुण ने सूझबूझ दिखाते हुए उन नए पौधों को अलग कर खेत के दूसरे हिस्सों में रोपना शुरू किया। कछुआ चाल से ही सही, लेकिन लगातार चार दशकों तक पौधों की संख्या बढ़ती गई और अनानास की खेती का दायरा फैलता गया। उस दौर में रायगढ़ और आसपास के जिलों में इस फल की खेती शून्य के बराबर थी, जिसके कारण उनका यह बाग पूरे अंचल में कौतूहल और अनुसंधान का विषय बन गया। अरुण साव के खेत में अनानास की बंपर पैदावार की जानकारी जब प्रशासन तक पहुंची, तो कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों और अधिकारियों की टीम ने साल्हेओना पहुंचकर उनके खेत का भौतिक निरीक्षण किया। कृषि अधिकारियों ने इसे धान प्रधान क्षेत्र में वैकल्पिक कृषि की एक क्रेडेंशियल फाइंडिंग्स के रूप में देखा। अरुण अपने इस बाग में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद, जहरीले कीटनाशकों या विकास प्रेरक दवाओं का उपयोग बिल्कुल नहीं करते। पूरी फसल पूरी तरह से प्राकृतिक और जैविक तरीके से तैयार की जाती है। पौधों की देखरेख, नियमित निराई-गुड़ाई और खेत की पारंपरिक सफाई के बलबूते ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादन लिया जा रहा है। साव का मानना है कि केमिकल-मुक्त होने के कारण इस अनानास का स्वाद बेहद मीठा और बाजार में मांग दमदार होती है। अनानास के पौधों के बीच खाली बची कस्टमाइज्ड जगह का उपयोग करने के लिए उन्होंने वहां कॉफी के पौधे भी रोप दिए हैं। इससे खेत की जैव विविधता बनी रहती है। उ त्पादित कॉफी का उपयोग वे अपनी घरेलू जरूरतों के लिए करते हैं। वर्तमान में साल्हेओना के इस बाग में अनानास की क्रेडेंशियल फसल पूरी तरह पककर तुड़ाई के लिए तैयार खड़ी है। अगले 15 से 20 दिनों के भीतर ये फल स्थानीय और जिला मुख्यालय के बाजारों में पहुंचने लगेंगे। अरुण अपनी उपज को बेचने के लिए किसी बिचौलिए पर निर्भर नहीं हैं। वे तैयार फसल को सीधे स्थानीय कूट बाजारों में ले जाते हैं। फल की गुणवत्ता के कारण सिंगल ट्रिप से उन्हें औसतन 14 से 15 हजार रुपए की नकद आय प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार, केवल 2 एकड़ के इस अनानास बाग से उन्हें पूरे साल में लगभग 2 से 2.5 लाख रुपए तक का शुद्ध लाभ (नेट प्रॉफिट) हो रहा है। इसके अतिरिक्त, उनकी अन्य कृषि भूमि पर धान की पारंपरिक खेती भी नियमित रूप से जारी है, जिससे परिवार को अतिरिक्त आर्थिक मजबूती मिलती है। नवाचारी किसान अरुण कुमार साव का कहना है कि कृषि को लाभ का धंधा बनाने के लिए किसानों को लीक से हटकर नई फसलों पर छोटे स्तर से कस्टमाइज्ड प्रयोग शुरू करने चाहिए। हर भौगोलिक क्षेत्र में कुछ ऐसी वैकल्पिक फसलें छिपी होती हैं, जो पारंपरिक खेती के नुकसान की भरपाई कर अतिरिक्त आय के क्रेडेंशियल अवसर पैदा कर सकती हैं। हालांकि, उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें इस बात की गहरी चिंता भी है कि नई पीढ़ी शारीरिक मेहनत और मुस्तैदी वाली खेती से धीरे-धीरे दूरी बना रही है। इसके बावजूद, वे दृढ़ता से मानते हैं कि वैकल्पिक कृषि और नवाचार ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कूट आधार देने और युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। इन प्रगतिशील किसान से और अधिक जानें…
मोबाइल : 7898618026
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