नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर: खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाए गए जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) फंड को कथित तौर पर सुनियोजित कमीशनखोरी और ठेका सिंडीकेट का माध्यम बना दिया गया। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) ने सोमवार को विशेष अदालत में करीब 5,000 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट पेश की, जिसमें अधिकारियों, बिचौलियों और कारोबारियों के गठजोड़ से संचालित बड़े नेटवर्क का राजफाश किया गया है।
जांच एजेंसी के अनुसार डीएमएफ फंड के उपयोग के नियमों में बदलाव कर सप्लाई आधारित प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा दिया गया, ताकि चुनिंदा कंपनियों को टेंडर दिलाकर भारी कमीशन वसूला जा सके। चार्जशीट में दावा किया गया है कि कारोबारी सतपाल सिंह छाबड़ा को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर शर्तों में बदलाव किए गए और इसके एवज में करोड़ों रुपये का अवैध लेन-देन हुआ।
स्वास्थ्य-शिक्षा के बजट को सप्लाई प्रोजेक्ट्स की ओर मोड़ा
– ईओडब्ल्यू के मुताबिक डीएमएफ फंड का मूल उद्देश्य खनन प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं का विकास था, लेकिन इसके बजाय स्मार्ट क्लास, आरओ वाटर प्यूरीफायर, कृषि उपकरण और सोलर लाइट जैसे सप्लाई आधारित कार्यों पर बड़े पैमाने पर खर्च किया गया। एजेंसी का आरोप है कि इन परियोजनाओं में वास्तविक जरूरत और गुणवत्ता के बजाय कमीशन आधारित सिस्टम काम कर रहा था। जिलों में एक तय नेटवर्क के जरिए टेंडर प्रक्रिया प्रभावित की जाती थी और पसंदीदा कंपनियों को काम दिलाया जाता था।
40 प्रतिशत तक कमीशन लेने का दावा
चार्जशीट में उल्लेख किया गया है कि 2019 से 2024 के बीच डीएमएफ फंड में करीब 9188.20 करोड़ रुपये जमा हुए। जांच में कई टेंडरों में 40 प्रतिशत तक कमीशन वसूले जाने की बात सामने आई है। एजेंसी के अनुसार कारोबारी सतपाल सिंह छाबड़ा ने पूरे नेटवर्क में कैश हैंडलर और बिचौलिए की भूमिका निभाई। जांच में दावा किया गया कि उसके जरिये करीब 60.75 करोड़ रुपये का कमीशन इकट्ठा किया गया, जिसमें से 14.62 करोड़ रुपये रिटायर्ड आइएएस अनिल टुटेजा तक पहुंचाए गए।
ईओडब्ल्यू ने बैंक ट्रांजेक्शन, डिजिटल रिकार्ड, मोबाइल डेटा और अन्य दस्तावेजों के आधार पर इस लेन-देन का उल्लेख किया है।
नीति स्तर पर बदलाव कराने का आरोप
– चार्जशीट में यह भी दावा किया गया है कि डीएमएफ नियमों में संशोधन कर सप्लाई आधारित टेंडरों का रास्ता साफ किया गया। जांच एजेंसी के मुताबिक प्रभावशाली अधिकारियों ने नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप कर कैबिनेट स्तर तक बदलाव करवाए। जांच में यह भी सामने आया है कि जिलों के कलेक्टरों पर विशेष कंपनियों को काम देने के लिए दबाव बनाया जाता था। एजेंसी ने मोबाइल चैट, वाट्सएप संदेश, नोटशीट और गवाहों के बयान को अहम साक्ष्य बताया है।
कोरबा में सबसे ज्यादा अनियमितता
ईओडब्ल्यू की जांच में कोरबा जिले में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां सामने आई हैं। चार्जशीट में निलंबित आइएएस रानू साहू की भूमिका का विशेष उल्लेख किया गया है। इसके अलावा तत्कालीन उप-सचिव सौम्या चौरसिया, कारोबारी सूर्यकांत तिवारी और माइनिंग विभाग के तत्कालीन अधिकारियों के नाम भी जांच में सामने आए हैं। एजेंसी ने कई कारोबारियों और सप्लायरों की भूमिका की भी जांच जारी रखने की बात कही है।
गरीबों के विकास का पैसा बना ‘कमीशन नेटवर्क
– जांच एजेंसियों का मानना है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के गरीब और ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए बनाए गए फंड को संगठित तरीके से कमीशन नेटवर्क में बदल दिया गया। चार्जशीट में यह संकेत दिए गए हैं कि पूरा सिस्टम फील्ड स्तर से लेकर नीति निर्माण तक जुड़े लोगों के तालमेल से संचालित हो रहा था।
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