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अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र ने कहा कि, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां समाज के विकास में बड़ी बाधा हैं। उन्होंने साफ कहा कि जादू-टोना जैसी चीजों का कोई अस्तित्व नहीं है, यह सिर्फ डर, असुरक्षा और अज्ञानता का परिणाम है। डॉ. मिश्र ने बताया कि पिछले 30 वर्षों में ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में काम करते हुए उन्होंने पाया कि जहां संसाधनों की कमी होती है, वहां असुरक्षा बढ़ती है और वहीं से अंधविश्वास जन्म लेता है। कई बार लोग बीमारी में अस्पताल जाने के बजाय ओझा-गुनिया के पास जाते हैं, जिससे इलाज में देरी और जान तक का खतरा बढ़ जाता है। महिलाओं पर लगते हैं टोना-टोटका के आरोप उन्होंने कहा कि कई मामलों में फसल खराब होने या पारिवारिक समस्या का कारण वैज्ञानिक नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति खासकर महिलाओं पर “डायन” का आरोप लगाकर निकाल लिया जाता है। इससे हिंसा और सामाजिक बहिष्कार जैसी गंभीर घटनाएं होती हैं। संविधान भी देता है वैज्ञानिक सोच अपनाने का अधिकार डॉ. मिश्र ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के तहत हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए। लेकिन सिर्फ कानून से सोच नहीं बदलती, इसके लिए लगातार जागरूकता जरूरी है। तर्क से ज्यादा असर दिखाने से होता है उन्होंने कहा कि लोगों को सीधे गलत कहने के बजाय समझाना जरूरी है। जब “चमत्कार” के पीछे का विज्ञान प्रयोगों से दिखाया जाता है, तो लोग खुद समझते हैं और उनकी सोच बदलती है। विज्ञान को खेती, स्वास्थ्य और आजीविका से जोड़ना होगा। अगर लोग अंधविश्वास छोड़कर सही दिशा में पैसा खर्च करें, तो उनका जीवन बेहतर हो सकता है। संगठनों के लिए 3 बड़े सुझाव नई चुनौतियों के साथ बढ़ेगा खतरा उन्होंने चेताया कि जलवायु परिवर्तन, नई बीमारियां और सोशल मीडिया की अफवाहें आने वाले समय में अंधविश्वास को और बढ़ा सकती हैं, इसलिए अभी से वैज्ञानिक सोच को मजबूत करना जरूरी है। नारा नहीं, आदत बने वैज्ञानिक सोच डॉ. मिश्र ने कहा कि “सोच बदलो, अंधविश्वास हटाओ” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जब लोग डर के बजाय तर्क और प्रमाण के आधार पर निर्णय लेने लगेंगे, तभी समाज में असली बदलाव आएगा। इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दिल्ली, महाराष्ट्र, ओडिशा और मध्यप्रदेश से भी सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
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