जस्टिस दुबे ने कहा:रेरा अपीलेट ट्रिब्यूनल की प्राथमिकता पुराने मामलों का त्वरित निपटारा, बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगाना

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हाई कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रजनी दुबे को छत्तीसगढ़ भू-संपदा अपीलीय अधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति पांच वर्ष या 67 वर्ष की आयु होने तक के लिए की है। उन्होंने मंगलवार को रायपुर में पदभार ग्रहण किया। इस दौरान दैनिक भास्कर से कहा कि लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई और निपटारा पहली प्राथमिकता है। इससे पीड़ितों को जल्द राहत मिलेगी और असंतुष्ट पक्ष को आगे अपील करने के लिए भी पर्याप्त समय मिलेगा। उन्होंने अवैध कॉलोनियों, प्रोजेक्ट में देरी, खरीदारों की रकम दूसरी जगह लगाने और रेरा के आदेशों का पालन नहीं होने जैसे मुद्दों पर भी बात की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश- बिना रजिस्ट्रेशन, डायवर्सन के प्रोजेक्ट व अवैध कॉलोनियों को लेकर पीड़ित क्या कर सकता है?
जवाब: प्रभावित व्यक्ति को सबसे पहले रेरा अथॉरिटी में शिकायत करनी चाहिए। वहां बिल्डर को नोटिस देकर दोनों पक्षों को सुना जाता है। गलती पाए जाने पर प्रोजेक्ट पर रोक लगाने और जुर्माना लगाने का प्रावधान है। लंबित प्रोजेक्ट में खरीदारों को कब्जा दिलाएंगी?
– हां, रेरा अथॉरिटी ऐसा आदेश दे सकती है। उसके आदेश को चुनौती दिए जाने पर मामला अपील के रूप में ट्रिब्यूनल के पास आएगा। कई बिल्डर खरीदारों की रकम दूसरे प्रोजेक्ट में लगा देते हैं, जिससे निर्माण में देरी होती है। इसे कैसे रोकेंगी?
– रेरा कानून में इसके स्पष्ट प्रावधान हैं। अथॉरिटी बिल्डर पर जुर्माना लगाने के साथ खरीदारों को ब्याज दिलाने का आदेश भी दे सकती है। रेरा के आदेशों का पालन नहीं होने पर ट्रिब्यूनल क्या कार्रवाई कर सकता है?
– आदेशों का सख्ती से पालन होना चाहिए। उल्लंघन पर बिल्डर का लाइसेंस रद्द करने और जुर्माना लगाने का प्रावधान है। मामला अपील में आने पर ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों को सुनकर उचित आदेश देगा। न्यायिक सेवा का अनुभव ट्रिब्यूनल में कितना उपयोगी होगा?
– मैंने 1990 में न्यायिक सेवा शुरू की और सिविल व आपराधिक, दोनों तरह के मामलों में काम किया। हाई कोर्ट में भी 8 वर्ष का अनुभव रहा। ट्रिब्यूनल के मामलों में सिविल प्रक्रिया के साथ कई बार दंडात्मक पहलू भी आते हैं, इसलिए यह अनुभव उपयोगी होगा। हाई कोर्ट के कौन-से फैसले आपके सबसे करीब रहे?
– सर्विस मैटर्स से जुड़े फैसले सबसे संतोषजनक रहे। जब 10 से 20 वर्षों से लंबित मामलों में किसी को पेंशन या उसका अधिकार मिलता था और वह कोर्ट में भावुक हो जाता था, तब त्वरित न्याय का वास्तविक महत्व महसूस होता था। पारिवारिक और वैवाहिक मामलों में क्या दृष्टिकोण रहा?
– पहली कोशिश समझौते की रहती थी, ताकि खासकर बच्चों के हित में परिवार टूटने से बच सके। जहां सुलह संभव न हो, वहां महिलाओं और बच्चों के भरण-पोषण तथा भविष्य की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर रहता था। बलौदाबाजार के एक मामले में आपने फांसी की सजा सुनाई थी। उसका आधार क्या था?
-फैसला सुप्रीम कोर्ट की ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ गाइडलाइन के तहत दिया गया था। एक ही परिवार की पांच महिलाओं की निर्मम हत्या की गई थी। संपत्ति हड़पने और असहाय महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों पर कड़ा संदेश देना जरूरी था। हाई कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी।
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