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Home » कोरिया फॉर्च्यूनर कांड…समझौते के लिए बुलाकर जिंदा जला डाला:भाजपा नेता के भाई बोले- पहले से हमले की तैयारी थी, हादसा दिखाने की कोशिश हुई
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कोरिया फॉर्च्यूनर कांड…समझौते के लिए बुलाकर जिंदा जला डाला:भाजपा नेता के भाई बोले- पहले से हमले की तैयारी थी, हादसा दिखाने की कोशिश हुई

By adminJune 21, 2026No Comments14 Mins Read
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छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के नागोई गांव में 16 जून की रात भाजपा नेता भरत सिंह उर्फ लल्ला सिंह को फॉर्च्यूनर में जिंदा जला दिया। उनके साथ मौजूद लोगों को बेरहमी से पीटा गया। भाजपा नेता समेत 3 लोगों की मौत हो गई। 2 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। घटना उस समय हुई जब रेत कारोबार को लेकर चल रहे विवाद के बीच दोनों पक्षों के बीच बातचीत और समझौते की कोशिश की जा रही थी। लल्ला सिंह के भाई राजेन्द्र सिंह ने कहा कि उनका परिवार समझौते के लिए गांव पहुंचा था, लेकिन वहां पहले से हमले की तैयारी कर ली गई थी। राजेन्द्र सिंह का आरोप है कि मनोज त्रिपाठी के लोगों ने फॉर्च्यूनर को घेरकर हमला किया और बाद में पूरी घटना को हादसा साबित करने की कोशिश की गई। यह हमला सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। मामले में पुलिस ने हत्या, आगजनी और साजिश समेत अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया है। 4 आरोपी पहले गिरफ्तार किए गए। वहीं मुख्य आरोपी मनोज त्रिपाठी समेत 4 आरोपियों ने शनिवार को सरेंडर कर दिया। 9वें आरोपी को खड़गवां से अरेस्ट किया गया। रेत कारोबार, राजनीतिक पकड़, वर्चस्व की लड़ाई और सालों पुराना पारिवारिक रिश्ता हिंसा में कैसे बदला? पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट… पहले देखिए ये तस्वीरें- भाई बोले- त्रिपाठी परिवार के लोग रेत उठाते, लेकिन पेमेंट नहीं देते थे दैनिक भास्कर की टीम सबसे पहले बैकुंठपुर में पीड़ित परिवार के घर पहुंची। मृतक लल्ला सिंह के भाई राजेंद्र सिंह ने बताया कि त्रिपाठी परिवार से हमारा रिश्ता केवल कारोबार का नहीं था, बल्कि पीढ़ियों पुराना पारिवारिक और धार्मिक संबंध था। हमारे पूर्वज ही रीवा से उनके परिवार को बैकुंठपुर लेकर आए थे, ताकि वे यहां पूजा-पाठ और कर्मकांड करा सकें। मनोज त्रिपाठी के दादा रामसुंदर त्रिपाठी हमारे परिवार के सभी धार्मिक अनुष्ठान कराते थे। बाद में उनके पिता राममिलन त्रिपाठी ने यह जिम्मेदारी संभाली। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि त्रिपाठी परिवार से हमारे रिश्ते इतने घनिष्ठ थे कि हम उनके परिवार के लोगों को नाम से नहीं, बल्कि ‘पाय लागी महाराज’ कहकर संबोधित करते थे। चाहे उनके घर का छोटा सदस्य ही क्यों न हो। ब्राह्मण भोज में चरण धोकर सम्मान देने की परंपरा भी निभाई जाती थी। हमारे परिवार के मन में हमेशा उनके लिए सम्मान रहा। मेरे भाई भरत सिंह उर्फ लल्ला सिंह का स्टोन क्रेशर का व्यवसाय था। वहीं मेरे भतीजे मयंक सिंह ने करीब 6 महीने पहले रेस्टोरेंट का काम बंद होने के बाद रेत का कारोबार शुरू किया था। दोनों परिवारों के रिश्तों में दरार तब आई जब हमें चिरमी रेत खदान का लाइसेंस मिला। हमें पहली बार चिरमी में रेत खदान का वैध लाइसेंस मिला था। इसके बावजूद त्रिपाठी परिवार के लोग वहां से रेत उठाते थे और रॉयल्टी या भुगतान नहीं देते थे। मेरा भाई लल्ला सिंह हमेशा यही कहता था कि ‘ये हमारे घर के पुरोहित रहे हैं, अगर पैसा नहीं भी देते तो जाने दो, विवाद मत करो।’ समस्या केवल उनके द्वारा रेत उठाने तक सीमित नहीं थी। वे दूसरे लोगों से भी कहते थे कि भुगतान मत करो। इससे हमारे व्यवसाय को नुकसान हो रहा था। इसी बात को लेकर मयंक ने उनसे कहा था कि यदि रेत लेनी है तो लें, लेकिन दूसरे लोगों को भुगतान नहीं करने के लिए न कहें। मयंक और त्रिपाठी पक्ष के लोगों के बीच कहासुनी हुई थी अगले दिन एक रेत से भरी गाड़ी को लेकर फिर विवाद हुआ। मयंक और त्रिपाठी पक्ष के लोगों के बीच कहासुनी हुई। मयंक गाड़ी से उतरा और उसने ड्राइवर को थप्पड़ मार दिया। इसके बाद दोनों पक्षों में गाली-गलौज हुई और त्रिपाठी पक्ष ने थाने में शिकायत दर्ज कराई। जब मयंक के खिलाफ शिकायत हुई तो हम भी काउंटर शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचे। उसी दौरान कुछ लोगों ने दोनों परिवारों के पुराने संबंधों का हवाला देते हुए विवाद को आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी। बाद में थाना प्रभारी ने भी समझौते की बात कही। इसके बाद त्रिपाठी पक्ष की ओर से बातचीत कर मामला सुलझाने का प्रस्ताव आया, जिसे हमने स्वीकार कर लिया। मेरे भाई लल्ला सिंह ने हमारे रिश्तेदार योगेन्द्र सिंह चौहान को मध्यस्थता के लिए बुलाया। योगेन्द्र सिंह ने सुझाव दिया कि दोनों पक्ष नागोई गांव में बैठकर विवाद सुलझाएं। उस दिन मयंक चिरमिरी गया हुआ था, इसलिए उसे लौटने में देर हुई। उसके साथ उसके चाचा नागेन्द्र सिंह और उसका मित्र विरेन्द्र सिंह उर्फ वीरू भी वहां पहुंचे। हमें प्रत्यक्षदर्शियों से जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक वहां पहुंचे लोगों को इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि उन पर हमला हो सकता है। वे निहत्थे थे। मौके पर जेसीबी, हाईवा और टिप्पर लगाकर रास्ता रोका गया। इसके बाद फॉर्च्यूनर वाहन को घेरकर हमला किया गया। हमारा आरोप है कि वाहन को रोकने के बाद उसके कांच तोड़े गए और पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई। मेरा भाई लल्ला सिंह और नागेन्द्र सिंह आग की चपेट में आ गए। इसी दौरान मयंक पीछे से पहुंचा और उसने वाहन का दरवाजा खोलने की कोशिश की। सबसे पहले योगेन्द्र सिंह बाहर निकले। उन्होंने हमलावरों से कहा कि उनका किसी से कोई विवाद नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उनके साथ भी मारपीट की गई। जब तक मयंक ने दरवाजा खोला, तब तक मेरा भाई लल्ला सिंह गंभीर रूप से झुलस चुका था। मयंक ने नागेन्द्र सिंह को बचाने की कोशिश की, लेकिन उस पर भी हमला किया गया। आज मयंक सिंह बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। विरेन्द्र सिंह मेरे चाचा का बेटा था। वो रायपुर में नौकरी करता था। उसका इस विवाद से कोई सीधा संबंध नहीं था। वह केवल मयंक के साथ वहां गया था, लेकिन इस घटना में उसकी भी जान चली गई। चुनाव के दौरान उसे बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी दी जाती थी राजेंद्र सिंह ने मेरा भाई लल्ला सिंह भारतीय जनता पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था। जनपद उपाध्यक्ष रहने के दौरान भी उसने संगठन के लिए काम किया। पार्टी कार्यक्रमों में उसकी सक्रिय भूमिका रहती थी। सोनहत क्षेत्र की पंचायतों में वह आर्थिक सहयोग भी करता था। चुनाव के दौरान उसे बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी दी जाती थी और वह जिन बूथों को जिताने का दावा करता था, वहां पार्टी को जीत भी दिलाता था। त्रिपाठी परिवार के भी भाजपा नेताओं से संबंध रहे हैं। इस संबंध में कई तस्वीरें भी सामने आ चुकी हैं। राजेंद्र सिंह ने कहा कि इस तरह की वारदात पहले शायद ही देखने को मिली हो। मैं आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहता हूं। जिस तरह हमारे परिवार की पूरी पीढ़ी खत्म हो गई, वैसे अपराधियों को भी कानून के तहत ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जिससे उन्हें अपने कृत्य का एहसास हो। हत्या को हादसा दिखाने की कोशिश हुई लल्ला सिंह के पारिवारिक मित्र रूपेश सिंह का कहना है कि यह पूरी घटना अचानक हुई हिंसा नहीं, बल्कि पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा थी। उनके मुताबिक घटनास्थल पर जो परिस्थितियां सामने आईं, वे किसी सुनियोजित हमले की ओर इशारा करती हैं। रूपेश सिंह का दावा है कि रास्ते को जेसीबी लगाकर ब्लॉक किया गया, फिर टिप्पर से फॉर्च्यूनर वाहन को टक्कर मारी गई और उसके बाद वाहन में आग लगा दी गई। उनके अनुसार यह सब कुछ एक तय योजना के तहत किया गया। रूपेश सिंह का यह भी आरोप है कि घटना को बाद में हादसे का रूप देने की कोशिश की गई। उनका कहना है कि वाहन को बिजली के खंभे की तरफ धकेला गया और ऐसी स्थिति बनाई गई, जिससे यह लगे कि बिजली के तार गिरने या करंट की वजह से वाहन में आग लगी है। रूपेश सिंह ने मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा कि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाने के लिए CBI जांच कराई जानी चाहिए। उनका कहना है कि मामले की गंभीरता और सामने आए आरोपों को देखते हुए स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराना जरूरी है, ताकि घटना से जुड़े सभी तथ्यों का खुलासा हो सके। पुलिस छावनी बना गांव, आग के निशान अब भी बाकी बैकुंठपुर में पीड़ित परिवार से बातचीत के बाद दैनिक भास्कर की टीम नागोई गांव पहुंची, जहां यह पूरी वारदात हुई थी। गांव में दाखिल होते ही सबसे पहले पुलिस की मौजूदगी नजर आती है। मुख्य सड़क पर बैरिकेडिंग है और पुलिस आने-जाने वालों पर नजर रख रही है। कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए यहां बीएनएस की धारा 163 लागू की गई है। गांव के अंदर बढ़ते ही एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होता है। सड़क पर न तो लोगों की भीड़ दिखाई देती है और न ही सामान्य दिनों जैसी चहल-पहल। कई घरों के दरवाजे बंद हैं और लोग कैमरे या बाहरी लोगों को देखकर बात करने से भी बचते नजर आते हैं। पूरा गांव अब भी उस रात की घटना के साये में दिखाई देता है। त्रिपाठी परिवार के घर की ओर जाने वाले रास्ते पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है। पूरा इलाका किसी छावनी जैसा नजर आता है। गांव के लोग खुलकर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं, लेकिन माहौल साफ बता रहा है कि घटना का असर अभी भी खत्म नहीं हुआ है। घटनास्थल पर पहुंचते ही उस रात की तस्वीरें जैसे आंखों के सामने तैरने लगती हैं। जिस जगह फॉर्च्यूनर जलकर खाक हुई थी, वहां आज भी टूटे हुए कांच के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। सड़क किनारे खड़ा आम का एक पेड़ दूर से ही नजर आता है। ग्रामीण बताते हैं कि इसी पेड़ के नीचे गाड़ी में आग लगी थी। पेड़ की कई पत्तियां आज भी झुलसी हुई हैं और शाखाओं पर आग के निशान दिखाई देते हैं। कुछ कदम आगे बढ़ने पर वह बिजली का खंभा दिखाई देता है, जिसे लेकर सिंह परिवार लगातार सवाल उठा रहा है। पुराना खंभा जमीन पर गिरा पड़ा है और टूटे हुए तार आसपास बिखरे हुए हैं। हालांकि बिजली विभाग ने उसकी जगह नया खंभा लगा दिया है, लेकिन पुराने खंभे और तार अब भी घटनास्थल के पास पड़े हैं। इन्हीं को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी बता रहे हैं। नागोई में अब आग बुझ चुकी है, लेकिन उसके निशान अब भी बाकी हैं। जले हुए पेड़, सड़क पर बिखरे कांच, गिरा हुआ खंभा और गांव में पसरा सन्नाटा इस बात की गवाही देते हैं कि यहां कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी चर्चा आने वाले दिनों तक होती रहेगी। सिंह और त्रिपाठी परिवार, राजनीतिक पकड़ और वर्चस्व की लड़ाई भरत सिंह उर्फ लल्ला सिंह इलाके की राजनीति और कारोबार में लंबे समय से सक्रिय रहे थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी और साल 1990 में जनपद अध्यक्ष भी बने थे। बैकुंठपुर के स्थानीय लोगों के मुताबिक 1990 के दशक में उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा, जब उन्होंने एक आंदोलन के दौरान टीएस सिंहदेव का रास्ता रोक दिया था। बताया जाता है कि किसी स्थानीय मुद्दे को लेकर चल रहे धरना-प्रदर्शन के दौरान उन्होंने टीएस सिंहदेव को आगे नहीं जाने दिया था। इस घटना के बाद इलाके में उनकी पहचान एक प्रभावशाली और दबंग नेता के रूप में बनने लगी। स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि लल्ला सिंह कभी पूर्व मंत्री डॉ. रामचंद्र सिंहदेव के करीबी माने जाते थे। हालांकि, बाद में दोनों पक्षों के बीच मतभेद इतने बढ़े कि मामला टकराव और मारपीट तक पहुंच गया था। हालांकि, राजनीतिक दलों से परे लल्ला सिंह के संबंध लगभग सभी दलों के नेताओं से अच्छे माने जाते थे। साल 2000 के बाद वे भाजपा नेताओं के करीब आए और पूर्व मंत्री भैय्यालाल राजवाड़े के करीबी सहयोगियों में उनकी गिनती होने लगी। स्थानीय राजनीति, खनन और कारोबारी गतिविधियों में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी। दूसरी तरफ, इस मामले के मुख्य आरोपी बताए जा रहे मनोज त्रिपाठी भी नागोई गांव के ही रहने वाले हैं। लल्ला सिंह और मनोज त्रिपाठी दोनों का मूल गांव एक ही था। हालांकि, सिंह परिवार सालों पहले बैकुंठपुर आकर बस गया था, जबकि त्रिपाठी परिवार नागोई में ही रह रहा था। स्थानीय स्तर पर मनोज त्रिपाठी का नाम रेत कारोबार और सरकारी ठेकों से जोड़ा जाता रहा है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि उनके बड़े राजनीतिक संपर्क थे और कई प्रभावशाली नेताओं तक उनकी पहुंच मानी जाती थी। स्थानीय चर्चाओं में उन्हें विधायक रेणुका सिंह के करीबी के रूप में भी देखा जाता रहा है। जानकारों के मुताबिक मनोज त्रिपाठी के नाम पर कोई वैध रेत खदान लाइसेंस नहीं था, लेकिन वह जनपद स्तर के कुछ प्रभावशाली लोगों के साथ मिलकर रेत कारोबार और सरकारी ठेकों में सक्रिय भूमिका निभाता था। नागोई और आसपास के इलाके में त्रिपाठी परिवार का भी खासा प्रभाव माना जाता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि सिंह और त्रिपाठी दोनों परिवार आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे। एक तरफ लल्ला सिंह का सालों पुराना राजनीतिक नेटवर्क था, तो दूसरी तरफ त्रिपाठी परिवार की स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ और कारोबार में दखल था। समय के साथ रेत कारोबार में बढ़ते दखल और प्रभाव को लेकर दोनों पक्षों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती गई, जिसे इलाके के लोग वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देखते हैं। रेत में इतना पैसा कि वर्चस्व की लड़ाई जान लेने तक पहुंच जाती है कोरिया, एमसीबी, सरगुजा और सीमावर्ती इलाकों में रेत का कारोबार सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करोड़ों रुपए का नेटवर्क बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह पड़ोसी राज्यों में रेत की ऊंची कीमत है। स्थानीय स्तर पर जिस रेत की कीमत 10 से 15 हजार रुपए प्रति हाईवा होती है, वही रेत झारखंड पहुंचने पर 40 से 50 हजार रुपए और उत्तर प्रदेश में 60 से 70 हजार प्रति हाईवा तक बिक जाती है। जानकारी के मुताबिक कोरिया जिले की रेत बड़े पैमाने पर मध्य प्रदेश भेजी जा रही है, जहां एक हाईवा रेत की कीमत करीब 40 हजार रुपए तक मिल रही है। स्थानीय जानकारों के मुताबिक केवल कोरिया जिले से ही हर दिन करीब 100 हाईवा रेत मध्य प्रदेश की ओर भेजी जा रही है। यही वजह है कि रेत घाटों पर कब्जा और वर्चस्व बनाए रखने की होड़ लगातार बढ़ रही है। इस कारोबार में स्थानीय नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, ठेकेदारों और रेत कारोबार से जुड़े लोगों की भूमिका भी अहम मानी जाती है। नियमों के मुताबिक माइनिंग विभाग ग्राम पंचायतों को रॉयल्टी यानी फिट पास जारी करता है। पंचायत में प्रस्ताव पारित होने के बाद ही खनन की अनुमति मिलती है। इसके अलावा पंचायत की रेत खदानों में मशीनों से खुदाई की अनुमति नहीं होती और मैनुअल लोडिंग का प्रावधान है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई देती है। प्रदेश के कई रेत घाटों में भारी मशीनों, खासकर चेन माउंटेन पोकलेन मशीनों से खुदाई की जा रही है। कई जगहों पर बिना फिट पास के ही रेत परिवहन की शिकायतें सामने आती रही हैं। इतना ही नहीं, कई बार एक घाट के लिए मिले लाइसेंस की आड़ में आसपास के दूसरे घाटों से भी रेत निकाली जाती है। जनकपुर और कोरिया क्षेत्र की रेत का बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश पहुंच रहा है। कारोबार में मुनाफा इतना ज्यादा है कि इसे लेकर विवाद, मारपीट और खूनी संघर्ष तक की घटनाएं सामने आती रहती हैं। ज्यादातर खनन रात के समय होता है और कई गंभीर विवाद भी इसी दौरान सामने आते हैं। स्थानीय स्तर पर लोगों का कहना है कि अवैध खनन और रेत से जुड़े अपराधों पर कार्रवाई का डर पहले जैसा नहीं रह गया है। कई मामलों में जांच और दस्तावेजी प्रक्रिया कमजोर रहने की शिकायतें सामने आती हैं। इसका फायदा आरोपियों को अदालत में मिलता है। जानकारों का मानना है कि जब तक खनन, परिवहन और प्रवर्तन व्यवस्था में सख्ती नहीं आएगी, तब तक रेत का काला कारोबार और इससे जुड़ी वर्चस्व की लड़ाई जारी रहेगी। …………………… इससे जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… छत्तीसगढ़- भाजपा नेता को फॉर्च्यूनर में जिंदा जलाया, 3 मौतें: हाईवा अड़ाकर लगाई आग, साथियों को फरसे से काटा, रेत तस्करी विवाद में हत्या छत्तीसगढ़ के कोरिया में रेत तस्करी को लेकर भाजपा नेता समेत 3 लोगों की हत्या कर दी गई। आरोपियों ने फॉर्च्यूनर के आगे-पीछे हाईवा अड़ाकर रास्ता रोका, फिर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी। इसमें भाजपा के पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष भरत सिंह उर्फ लल्ला सिंह जिंदा जल गए। पढ़ें पूरी खबर



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