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कोंडागांव के ग्राम पंचायत बोरगांव में चैत्र मास के समापन पर बंगाली समुदाय ने पारंपरिक ‘चरक उत्सव’ के अंतर्गत ‘खेजूर भांगा’ (खजूर तोड़ना) का आयोजन किया। पश्चिम बोरगांव तालाब के किनारे हुए इस उत्सव में भक्ति और साहस का अनूठा संगम देखने को मिला। खेजूर भांगा उत्सव भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास की एक कठिन परीक्षा है। इस दौरान ‘सन्यासी’ (व्रतधारी) नंगे पैर विशाल और कंटीले खजूर के पेड़ों पर चढ़े। ढोल-नगाड़ों की थाप और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच, इन सन्यासियों ने पेड़ की फुनगी पर खड़े होकर नृत्य किया। तीखे कांटों के बीच भी सन्यासियों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखी। सन्यासी करते है 1 माह अन्न का त्याग
पेड़ की ऊंचाई पर नृत्य करते हुए सन्यासियों ने जब कच्चे खजूर के फल नीचे फेंकना शुरू किया, तो उसे पाने के लिए भक्तों में भारी उत्साह देखा गया। धार्मिक मान्यता है कि यह खजूर महादेव का आशीर्वाद है, जो सुख-समृद्धि और आरोग्य प्रदान करता है। बंगाली समुदाय के इस प्राचीन अनुष्ठान के पीछे गहरी आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। उत्सव से पूर्व सन्यासी पूरे एक महीने तक अन्न का त्याग कर कठिन उपवास और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। यह माना जाता है कि पूर्ण भक्ति और नियमों के पालन से शरीर दैवीय शक्ति से भर जाता है, जिससे नुकीले कांटे और ऊंचाई उन्हें प्रभावित नहीं करती। तालाब किनारे आयोजित इस मेले में न केवल स्थानीय ग्रामीण, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग इस विरल दृश्य के साक्षी बनने पहुंचे। शाम ढलते-ढलते पूरा बोरगांव भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो गया।
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