कोंडागांव जिले में दीपावली के अगले दिन परंपरागत गौरा-गौरी पूजा की गई। इस अवसर पर ग्रामीणों ने देवी-देवताओं के साथ-साथ अपने पशुओं, विशेषकर गायों की भी विधिवत पूजा-अर्चना की। ग्रामीण अंचलों में सुबह से ही उत्सव का माहौल था।
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महिलाओं ने स्नान के बाद गौरा-गौरी की मूर्तियां तैयार की और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। यह पर्व भगवान शंकर और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है।
किसानों और पशुपालकों ने अपने गोठान व आंगन को सजाया। उन्होंने गायों को नहलाकर रंग-बिरंगी पुष्पमालाओं से सजाया और उनकी आरती उतारी। इस दौरान “जय गौ माता” के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। बच्चों और बुजुर्गों ने भी इस पूजा में उत्साहपूर्वक भाग लिया और गाय को खिचड़ी का भोग लगाया।

खिचड़ी भोज का आयोजन
पूजा के बाद पारंपरिक रूप से खिचड़ी भोज का आयोजन किया गया। इसमें लोगों ने अपनी गायों के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। ऐसी मान्यता है कि इस दिन गौ-पूजा करने से वर्षभर समृद्धि, सौभाग्य और उत्तम पशुधन की प्राप्ति होती है।
कई स्थानों पर ग्रामीण महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाए और गौरा-गौरी की झांकी सजाकर नृत्य प्रस्तुत किया। युवाओं ने भी घर-घर जाकर एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं। पूरे कोंडागांव जिले में यह पर्व श्रद्धा और लोक परंपरा के रंगों में सराबोर रहा।
पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व
स्थानीय निवासी माया राम और विकी दास ने बताया, “हम हर साल दीपावली के बाद गायों की पूजा करते हैं। ये हमारे परिवार का अभिन्न अंग हैं। जिस प्रकार हम देवी-देवताओं की आराधना करते हैं, उसी प्रकार गौमाता की सेवा भी करते हैं।
“कोंडागांव में गौरा-गौरी पूजा ने दीपोत्सव की खुशियों को और बढ़ा दिया। देवी-देवताओं की आराधना के साथ-साथ पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की यह परंपरा बस्तर की समृद्ध लोकसंस्कृति का एक सुंदर उदाहरण है।
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