छठ महापर्व की शुरुआत 25 अक्टूबर से नहाय-खाय से होने जा रही है। छठ व्रतियों ने पर्व की तैयारी शुरू कर दी है। घर की साफ-सफाई के साथ-साथ पूजन सामग्रियों की खरीदारी भी शुरू हो गई है। पर्व को लेकर बाजार भी सज गए हैं। बाजारों में केवल छठ पर दिखने वाले फल न
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फल मंडी के अध्यक्ष अनिल सलूजा ने बताया कि फलों के दाम सामान्य हैं। उन्होंने बताया कि अभी केले की खपत 120 टन है। छठ महापर्व के लिए 200 टन मंगाया गया है। वहीं सेब, मोसम्बी, अनार, संतरा, नारियल की खपत 80 टन है। इसकी भी छठ महापर्व को लेकर 150 टन मंगाया गया है। सलूजा ने बताया कि रायल सेब 130 से 180 रुपया किलो, रायल गाला सेव 180 से 220 रुपए किलो है। अमेरिकी सेव 150 से 220 रुपए था, अब 140 से 180 रुपए हो गया है।

वहीं मौसम्बी 50 से 60 रुपए, अनार 120 से 200 रुपए किलो, संतरा 80 से 100 रुपए किलो, केला 50 से 60 रुपए दर्जन बिक रहा है। तैयारी में समिति के प्रवीण झा, डॉ. धर्मेंद्र दास, अभयनारायण राय, सुधीर झा, बीएन ओझा, राम प्रताप सिंह, रोशन सिंह लगे हुए हैं। तोरवा छठघाट पर मां अरपा की महाआरती 2100 दीपों से होगी। महाआरती शाम 4.30 बजे से होगी। इसमें श्रीश्री 1008 प्रेमदास जी महाराज शामिल होंग।
वहीं आरती के अतिथि केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, उपमुख्यमंत्री अरुण साव, बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल, बिल्हा विधायक धरमलाल कौशिक, तखतपुर विधायक धर्मजीत सिंह, बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला, कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव, मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया, महापौर पूजा विधानी, सभापति विनोद सोनी, जिला पंचायत अध्यक्ष राजेश सूर्यवंशी हैं। छठघाट 7 एकड़ में फैला है। पहले यहां स्थाई घाट 750 मीटर का था। पिछले सालों में इसे बढ़ाकर 800 मीटर पक्का घाट बना दिया गया था। इस बार फिर समिति ने 50 मीटर कच्चा घाट बढ़ा दिया है। अब लगभग 850 मीटर का घाट हो गया है। समिति के सदस्य शुक्रवार को आरती और पार्किंग व्यवस्था की तैयारी में लगे रहे।
समिति के प्रवीण झा ने बताया कि पार्किंग व्यवस्था के लिए प्रशासन के साथ सहयोग लेकर वन विभाग की ओर नई जगह पर लेवलिंग का कार्य जेसीबी से किया जा रहा है। यातायात विभाग, पीडब्लूडी, वन विभाग और नगर निगम सहयोग कर रहा है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के निर्देशानुसार वन विभाग में दो पार्किंग बढ़ाई जा रही है। आने के समय तो व्रती दोपहर से लेकर शाम तक पहुंचते हैं, पर अर्घ्य देने के बाद एक साथ निकलते हैं। इसलिए निकासी के लिए रास्तों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
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