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अपनी विशिष्ट आदिवासी पहचान, जीवंत परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए प्रसिद्ध बस्तर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय आकर्षण का केंद्र बन गया है। इन दिनों इजराइल से आए चार विदेशी पर्यटक बस्तर भ्रमण पर हैं, जो यहां की कला, संस्कृति, लोकजीवन और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से गहराई से प्रभावित नज़र आ रहे हैं। शिल्प ग्रामों से लेकर हाट-बाज़ार और पारंपरिक चिकित्सा तक, बस्तर का हर रंग उन्हें अपनी ओर खींच रहा है।
विदेशी पर्यटकों ने कोंडागांव, कुम्हारपारा, बुनागांव, नारायणपुर और गढ़बेंगाल जैसे प्रमुख शिल्प केंद्रों का भ्रमण किया। यहां उन्होंने विश्वविख्यात घड़वा शिल्प, लौह शिल्प और मृदा शिल्प को नजदीक से देखा। पारंपरिक तकनीकों से तैयार हो रही कलाकृतियां, सदियों पुराने औज़ार और उनमें समाहित सांस्कृतिक प्रतीकों ने उन्हें खासा प्रभावित किया। पर्यटकों ने स्थानीय कारीगरों से सीधे संवाद किया और हस्तनिर्मित शिल्प सामग्री की खरीदारी भी की, जिससे कारीगरों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिला। उनके अनुसार, बस्तर का शिल्प केवल कला नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है।
कला और बाजार के साथ-साथ बस्तर की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों ने भी पर्यटकों को आकर्षित किया। सिरहा–गुनिया द्वारा अपनाई जाने वाली उपचार प्रणाली, जड़ी-बूटियों का उपयोग और आध्यात्मिक विश्वासों पर आधारित चिकित्सा पद्धति को उन्होंने प्रकृति और मानव के बीच संतुलन का अनूठा उदाहरण बताया। इजराइल की योग शिक्षिका तहाली ने योग और आदिवासी चिकित्सा के बीच समानताओं पर विशेष रुचि दिखाई और इसे समग्र स्वास्थ्य की अवधारणा से जोड़ा। बस्तर ट्राइबल होम स्टे के संचालक शकील रिज़वी ने बताया कि थाली, एनत, रोन और बोआज़ नामक ये पर्यटक 10 दिवसीय भ्रमण पर हैं ।
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