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रायपुर दूरदर्शन के शुरुआती दिन: जब गांवों में टीवी की होती थी पूजा, एंटीना घुमाने की थी अनोखी कहानी

रायपुर दूरदर्शन केंद्र ने हाल ही में अपने 50 साल का सफर पूरा किया है, और इस अवसर पर इसके शुरुआती दौर की यादें ताजा हो गई हैं। एक ऐसा समय था जब टेलीविजन देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। 1970 के दशक में, जब महानगरों में भी टीवी दुर्लभ था, तब रायपुर के गांवों में एक ‘जादुई बक्सा’ लोगों के मनोरंजन और सूचना का केंद्र बन गया था।

उस दौर में, शाम ढलते ही गांवों के लोग बरगद के पेड़ के नीचे इकट्ठा होने लगते थे। उनके सामने लकड़ी के शटर वाला एक ब्लैक एंड व्हाइट टीवी होता था, जिसे वे प्यार से ‘जादुई बक्सा’ कहते थे। आसपास के गांवों से भी लोग पैदल चलकर इस अनोखे उपकरण पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम देखने पहुंचते थे, जो उस समय के लिए एक बड़ी घटना हुआ करती थी।

रायपुर दूरदर्शन के डायरेक्टर संजय कुमार मिश्रा बताते हैं कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई का सपना ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाना था। इसी दूरदर्शी सोच के साथ, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मिलकर सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) की शुरुआत की थी।

यह महत्वपूर्ण प्रयोग 1 अगस्त 1975 से शुरू होकर 31 जुलाई 1976 तक चला। इस दौरान रायपुर कार्यक्रम निर्माण के प्रमुख केंद्रों में से एक था। SITE के माध्यम से गांवों तक खेती-किसानी की नई तकनीकें, स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां और शिक्षाप्रद सामग्री पहुंचाई गई, जिससे ग्रामीण जीवन में एक बड़ा बदलाव आया।

टीवी के प्रति लोगों का उत्साह अद्वितीय था। भाटापारा के तरेंगा सहित कई गांवों में लोग कार्यक्रम शुरू होने से पहले अगरबत्ती जलाकर टीवी की पूजा करते थे। बाद में जब घरों पर यागी एंटीना लगने लगे, तो सिग्नल पकड़ने के लिए छत पर एंटीना घुमाने और नीचे से ‘आया क्या?… हां, अब साफ है!’ जैसी आवाजें आने का सिलसिला आम हो गया था।

रायपुर दूरदर्शन ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति को एक विशाल मंच प्रदान किया। पंडवानी गायिका तीजन बाई, भरथरी गायिका सुरुजबाई खांडे और झाड़ूराम देवांगन जैसे महान लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां दूरदर्शन के माध्यम से घर-घर तक पहुंचीं, जिससे उनकी कला को व्यापक पहचान मिली।

‘भुइयां के गोठ’ और ‘बस्तर अंचल से’ जैसे विशेष कार्यक्रमों ने जनजातीय जीवनशैली, ढोकरा कला और स्थानीय परंपराओं को प्रमुखता से दर्शाया। इन कार्यक्रमों ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपग्रह से शुरू हुआ प्रसारण का यह सफर अब मोबाइल और ओटीटी प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुका है, जो दूरदर्शन की लंबी यात्रा को दर्शाता है।

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