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इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर और भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे (मुंबई) के संयुक्त सहयोग से विकसित धान की छह उन्नत म्यूटेंट किस्मों का कृषि महाविद्यालय रायपुर में प्रगतिशील किसानों को वितरण किया गया। ये किस्में पारंपरिक प्रजातियों की तुलना में जल्दी पकती हैं, ज्यादा उपज देती हैं, कम ऊंची होती हैं और कीट-व्याधियों के प्रति अधिक सहनशील हैं। वितरित की गई उन्नत किस्म की धान में विक्रम ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ राइस (विक्रम टीसीआर), ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ विष्णुभोग म्यूटेंट। ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ सोनागाथी म्यूटेंट, ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेंट-1, बौना लुचाई और ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ जवाफूल म्यूटेंट शामिल हैं। पिछले दस साल से चल रहा म्यूटेशन ब्रीडिंग का काम कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि विगत 10 वर्षों से बार्क के सहयोग से म्यूटेशन ब्रीडिंग के माध्यम से फसल सुधार का कार्य किया जा रहा है। अब तक धान की 7 म्यूटेंट किस्में सहित अन्य फसलों की नई उन्नत किस्में विकसित की जा चुकी हैं। डॉ. चंदेल ने बताया कि म्यूटेशन ब्रीडिंग से अवांछित गुणों को हटाकर वांछित गुण शामिल किए जा रहे हैं, जिससे ज्यादा उपज, कम अवधि, कम ऊंचाई, कीट-रोग प्रतिरोधक, सूखा सहनशील और पोषक तत्वों से भरपूर किस्में तैयार हो रही हैं। इससे छत्तीसगढ़ की पारंपरिक किस्मों के दुर्लभ गुणों को संरक्षित रखते हुए सुधार संभव हो रहा है। नाभिकीय ऊर्जा के उपयोग दी गई जानकारी भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर के अपर संचालक प्रो. पी.ए. हसन ने म्यूटेशन ब्रीडिंग तकनीक और रेडियेशन के जरिए फसलों में वांछित गुण जोड़ने के महत्व पर प्रकाश डाला। नाभिकीय कृषि और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख डॉ. ए.डी. बल्लाल ने कृषि क्षेत्र में नाभिकीय ऊर्जा के उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी। कृषि उत्पादन आयुक्त शहला निगार ने कहा कि इस खरीफ में पुरानी धान किस्मों के 40 प्रतिशत क्षेत्र को नई उन्नत किस्मों से प्रतिस्थापित करने की योजना है। इन म्यूटेंट किस्मों का इसमें अहम योगदान रहेगा। ये रहे मौजूद कृषि महाविद्यालय रायपुर की अधिष्ठाता डॉ. आरती गुहे, संचालक अनुसंधान डॉ. वी.के. त्रिपाठी, निदेशक विस्तार सेवाएं डॉ. एस.एस. टूटेजा सहित विभिन्न विभागाध्यक्ष और प्रदेश भर से आए प्रगतिशील किसान।
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