सिंगर रूप कुमार राठौड़ साउंड ऑफ सोल सीजन-3 में परफार्म करने रविवार को रायपुर पहुंचे थे। परफॉर्मेंस के बाद राठौड़ ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपनी निजी जिंदगी, तबला छोड़ सिंगर बनने की वजह और जीवन के संघर्ष के समय से जुड़े किस्सों
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सवाल- रायपुर में पिछले तीन प्रोग्राम आप के कैंसिल हो गए थे। इस तरह की चीजें मेंटली तौर पर कितना इफैक्ट करती हैं? जवाब- कई बार होता है, चीजें आप जैसा सोचते हैं उस तरह से नहीं हो पाती है। अब तो ऐसा है कि हम प्रोफेशनली तौर पर इस तरह के चीजों को प्री-प्रिपेयर्ड रखते हैं। क्योंकि जो बनना-बिगड़ना चलता रहता है। आपको मौके पर नहीं चूकना है, बस ये ध्यान में रहना चाहिए।

परफार्म करते हुए रूप कुमार राठौड़।
सवाल- परफार्मेंस के पहले कितनी तैयारी करनी होती, खुद को हर बार कैसे मोटिवेट करते हैं? जवाब- किसी भी परफार्मेंस से एक सप्ताह पहले से ही तैयारी शुरू हो जाती है। पूरी टीम साथ बैठती है, डिस्कस करते हैं, प्लान बनाते हैं। कब कौन सा सॉन्ग होना है, लिस्टेड करने के बाद रिहर्सल होता है। अच्छा करने में पूरी टीम का एफर्ट लगता है। यही है कि परफार्मेंस से पहले आपका अभ्यास का स्तर आपका मोटिवेशन लेवल डिसाइड करता है।

अपनी टीम के साथ रूप कुमार राठौड़।
सवाल- 1984 में ऐसा क्या हुआ कि आप तबला छोड़कर, सिंगर बन गए? जवाब- मंच पर पिता जी परफार्म कर रहे थे। सामान्य तौर पर गुरू के पीछे दो शागिर्द होते हैं। जो तानपुरा बजाते हैं और बीच-बीच में गाते हैं। उस दिन एक शागिर्द नहीं आया था। मैंने सोचा तानपूरा बजाने मैं बैठ जाता हूं। तो मैं बैठ गया। महफिल जमी, कुछ समय बीता। तो माहौल के बीच पिता जी भूल गए कि पीछे बेटा बैठा है, शागिर्द नहीं।
उन्होंने जब सुर लगाने को कहा तो लेफ्ट की ओर बैठे शागिर्द ने सुर लगाया। लेकिन दाहिने ओर मैं बैठा था। वहां से सुर लगा नहीं। पिता जी ने मुझे देखा। मैं बहुत शर्मिंदा हुआ। फिर पिता जी की खुशी के लिए तबला छोड़ गाना शुरू किया।

रायपुर में उनके पर परफार्मेंस के बाद दोनों डिप्टी सीएम खड़े होकर तालियां बजाने लगे।
सवाल- पत्नी सुनाली आपके साथ मंच पर परफार्म करती हैं, उनके आपके जीवन में आने के बाद कितना बदलाव आया? जवाब- पत्नी सुनाली भाग्य लक्ष्मी के रूप में जीवन में आई। उसके आने के बाद पूरा जीवन बदल गया, सिर्फ मेरा ही नहीं पूरे परिवार का। हम तीन भाई संगीत की दुनिया में हैं। बड़े भाई श्रवण और विनोद भी सिंगर हैं। हम तीनों का काम नहीं चल रहा था।
लेकिन1987 में जब सुनाली ने मंगनी हुई, तो तीनों भाइयों के सितारे बुलंद हो गए। सबका काम चल पड़ा।

पत्नी सुनाली हर मंच पर पर उनके साथ परफॉर्म करती हैं।
सवाल- प्रोफेशनल तौर शुरुआत दिनों में संघर्ष दौर कैसा था? जवाब- मैं 18 साल का था, जब प्रोफेशनली तौर पर तबला वादन शुरू किया। पहली कमाई 5 रूपए की थी। सुबह दस बजे से रात आठ बजे तक तबला वादन करते थे। एक डांसिंग ग्रुप था। उसमें कुछ महिलाएं थीं, जो राजस्थानी फोक सॉन्ग पर डांस करती थीं।
मैं उनके लिए तबला वादन करने जाता था। दस घंटे तबला वादन करने के बाद रात को 5 रूपए मिलते थे। इस तरह से संघर्ष चला, लेकिन उस 5रूपए कि कमाई में भी फीलिंग राजा वाली आती थी।
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